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ऑक्सीवनों की स्थापना व पुराने पेड़ों के लिए ‘पेंशन’ अनूठी योजनाएं : चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में पर्यावरण प्रदूषण पर चर्चा

करनाल। हरियाणा सरकार ने राज्य भर में ऑक्सीवनों की स्थापना व विकास के लिए का फैसला किया है। इस दिशा में पहल करते हुए करनाल में ऑक्सीवन शुरू भी हो चुका है और पंचकूला में भी ऑक्सीवन प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। ऐसा पर्यावरण को स्वच्छ और सांस लेने लायक बनाए रखने के उद्देश्य से किया जा रहा है। एक पेड़ जीवन भर के दौरान करीब 70 लाख का ऑक्सीजन देता है। इसलिए, पौधे जरूर लगाएं और उनका संरक्षण भी करें। जितना पेड़ लगाएंगे, उतना ही पर्यावरण को बचाएंगे। बड़े वृक्षों के संरक्षण के लिए मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने अनूठी पेंशन योजना भी शुरू करने का ऐलान किया है जिसके अंतर्गत वयोवृद्ध वृक्षों की संभाल करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं को राज्य सरकार उनकी इस सेवा के एवज़ में पेंशन देगी। रेडियो ग्रामोदय के ‘वेकअप करनाल’ कार्यक्रम में हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के करनाल स्थित क्षेत्रीय अधिकारी शैलेंद्र अरोड़ा से पर्यावरण प्रदूषण पर चर्चा के दौरान हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने की। उन्होंने कहा कि जीव-जंतु, पृथ्वी, जल वायु और मिट्टी आदि मिलकर हमारे पर्यावरण को बनाते हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों के आपसी असंतुलन को ही पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं। पर्यावरण प्रदूषण से सबका जीवन खतरे में पड़ सकता है। एक पेड़ एक बच्चे के बराबर होता है। इसलिए उनका भी संरक्षण जरूरी है।

Wake Up Karnal : Environment Day

पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कारकों की पहचान करते हुए शैलेंद्र अरोड़ा ने कहा कि जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, बायो मेडिकल वेस्ट, म्युनिसिपल सॉलि़ड वेस्ट, ई-कचरा, बैटरी का कचरा आदि मिलकर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 6 महीने के दौरान प्रदूषण को रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने करनाल में कई कदम उठाए हैं। प्रदूषित जल के शोधन के लिए मल संयंत्रों में ऑनलाइन सिस्टम और नई एसपीआर टेक्नोलॉजी लगाई गई है। उनके पैरामीटर सख्त कर दिए गए हैं जिनका पालन करना अनिवार्य है। इनका पालन न करने वालों पर जुर्माने की राशि का प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा वाटर एक्ट जिसे जल प्रदूषण नियंत्रण एक्ट 1974 भी कहा जाता है के तहत अवैध रूप से स्थापित उद्योगों के खिलाफ भी विभाग ने कड़ी कार्रवाई की है। ऐसे सात – आठ उद्योगों को बंद भी किया गया है। 1 साल के भीतर वॉटर एक्ट के तहत 9 मामले दर्ज किए गए हैं। स्पेशल एनवायरनमेंट एक्ट के तहत उद्योगों एवं बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई रूटीन की प्रक्रिया है। उन्होंने स्पष्ट किया की गंदा पानी छोड़ने वाले उद्योगों के खिलाफ वाटर एक्ट के तहत करवाई होती है। इसके अलावा बिना अनुमति के स्थापित होने वाले उद्योगों के खिलाफ भी कार्यवाही की जाती है।

डॉ. बीरेन्द्र सिंह चौहान ने पूछा कि उद्योग आम तौर पर किस-किस तरह से पर्यावरण संरक्षण के नियमों को तोड़ते हैं? उनके खिलाफ किस तरह की शिकायतें आती हैं? इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि जल शोधन संयंत्रों की नियमित चेकिंग की जाती है। इस दौरान जहां भी छेड़छाड़ पाई जाती है वहां उन्हें नोटिस देकर कार्रवाई की जाती है। इतने पर भी ना मानने पर उन उद्योगों को बंद कराने की प्रक्रिया शुरू होती है और उन पर पर्यावरण कंपनसेशन भी लगाया जाता है।

एडवोकेट राजेश शर्मा ने शिकायत की कि करनाल क्षेत्र में कई उद्योगों ने बिना अनुमति के सबमर्सिबल पंप लगा रखे हैं। इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि कुछ उद्योग प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और कुछ उद्योग नगर निगम के दायरे में। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दायरे में आने वाले उद्योगों से ऑनलाइन आवेदन मांगे जाते हैं। उनकी निगरानी के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी होती है। जो उद्योग नियमों का पालन नहीं करते, उन पर कार्रवाई होती है।

इस अवसर पर डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने केंद्र सरकार की नई पहल के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर घोषणा की है की वर्ष 2025 तक देश की हर स्थान पर पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की व्यवस्था की जाएगी। केंद्र सरकार का ग्रीन एनर्जी पर जोर है। सौर ऊर्जा के मामले में भारत विश्व नेता बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने पूछा कि करनाल शहर की हवा राज्य के अन्य शहरों के मुकाबले पर्यावरण की दृष्टि से कितनी प्रदूषित है? इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि 2 दिन का डाटा एयर क्वालिटी इंडेक्स (ए क्यू आई) के मानकों के अनुसार 54 और 73 के आसपास था। उन्होंने बताया कि करनाल का ए क्यू आई कुरुक्षेत्र के मुकाबले बेहतर है।

हरियाणा के ग्रामीण अंचल में पर्यावरण से जुड़े मसले और बड़ी चुनौतियां क्या हैं? डॉ चौहान के इस सवाल पर अरोड़ा ने कहा कि गांव में सीवरेज सिस्टम का ना होना एक बड़ी चुनौती है। स्मार्ट सिटी के लिहाज से पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए शहर में काम शुरू हुआ है। इसके तहत ट्री-प्लांटेशन और रोड क्लीनिंग की जा रही है।

कई जगह लग रहे सॉलिड वेस्ट प्लांट

शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया की कचरा निस्तारण के लिए करनाल में एक सॉलिड वेस्ट प्लांट पहले से कार्यरत है। इसके अलावा सोनीपत में भी एक प्लांट का निर्माण हो रहा है। असंध क्षेत्र में भी एक बहुत बड़ा प्लांट लगने वाला है। पंचायती राज विभाग ने 35 छोटे-छोटे प्रोजेक्ट का प्रस्ताव सरकार को भेज रखा है। अन्य जगहों पर डंपिंग ग्राउंड मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि करनाल जिले के जल स्रोतों में यमुनानगर का औद्योगिक कचरा मिलने के संबंध में यमुनानगर के संबंधित अधिकारियों से औपचारिक शिकायत कर इसे रोकने के लिए कदम उठाने के लिए कहा गया है। इस सिलसिले में 6 महीने पहले भी दोनों जिलों के अधिकारियों के बीच पत्राचार हुआ था। शैलेंद्र अरोड़ा ने गीले और सूखे कचरे को घर में ही अलग-अलग करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इससे कूड़ा निस्तारण की प्रक्रिया आसान हो जाती है।

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बाल श्रम अपराध, जहां भी देखें 1098 पर तुरंत दर्ज कराएं शिकायत : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय  हो’ में श्रम कानून एवं बच्चों के शोषण पर चर्चा

करनाल। बाल श्रम अभिशाप है। यह सामाजिक अपराध भी है। बाल श्रम होता देख कर भी चुप रहना इस कृत्य में बराबर का भागीदार होने जैसा है। इसलिए संवेदनशील बनें और इसके खिलाफ आवाज उठाएं। आप चाहें तो गुमनाम रहकर भी 1098 पर ऐसे मामलों की सूचना दे सकते हैं। बच्चों का उत्पीड़न करना अपराधी को पैदा करने जैसा है क्योंकि बड़ा होने पर ऐसे बच्चों के अपराध की ओर उन्मुख होने की संभावना ज्यादा होती है। इसलिए, सजग नागरिक का कर्तव्य निभाएं।

रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में बाल श्रम कानून एवं बच्चों के शोषण पर विषय पर हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान और हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त श्रमायुक्त अनुपम मलिक के बीच चर्चा के दौरान उभर कर सामने आए। दोनों इस बात पर एकमत थे कि यदि कोई हमारा परिचित या मित्र भी बाल शोषण में शामिल हो, तो उसे टोकना हमारा धर्म है।

जय हो में आज चर्चा बाल श्रम पर

डॉ. चौहान ने कहा कि यह दुर्भाग्य की बात है कि तमाम सख्ती और कानून के बावजूद बाल श्रम एवं शोषण का देश में अब तक उन्मूलन नहीं हो सका है। अनुपम मलिक ने उनकी बात से सहमति जताते हुए कहा कि यद्यपि बाल श्रम एवं शोषण के मामले पहले के मुकाबले काफी कम हुए हैं, फिर भी पूरी तरह यह आज भी खत्म नहीं हो सका है।

अनुपम मलिक ने बताया कि बाल श्रम के खिलाफ वर्ष 2006-2007 में श्रम विभाग की ओर से एक मुहिम चलाई गई थी जिसके तहत ऐसे मामलों के सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया था। श्रम निरीक्षकों को कैमरे भी दिए गए थे। ताबड़तोड़ छापों का सिलसिला शुरू किया गया था। इससे बाल शोषण में काफी कमी आई। चंडीगढ़ और दिल्ली के बीच हाईवे पर स्थित सैकड़ों ढाबों में बाल श्रम एवं उत्पीड़न के अनगिनत मामले थे, लेकिन विभाग की सख्ती के बाद बाल शोषण के मामले अब वहां नगण्य के बराबर हैं। ढाबों, दुकानों एवं फैक्ट्रियों से छुड़ाए गए बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए हरियाणा के फरीदाबाद, यमुनानगर और पानीपत में बाल पुनर्वास केंद्र बनाए गए थे।

नुपम मलिक के अनुसार यमुनानगर, पानीपत और फरीदाबाद के मामलों में अलग-अलग सोच देखी गई। फरीदाबाद में जहां मां-बाप ही अपने बच्चों को मारपीट कर कारखानों में काम करने के लिए भेजते थे, वहीं यमुनानगर में लोग यूपी से आकर अपने बच्चों को फैक्ट्री मालिकों के पास गिरवी रख जाया करते थे। विभाग ने ऐसे मां-बाप के खिलाफ भी सख्ती की और उन्हें पकड़ना शुरू किया। इसके बाद ऐसे मामलों पर तेजी से अंकुश लगा और बाल श्रम लगभग समाप्ति के कगार पर पहुंचा। लेकिन पानीपत का मामला अलग ही है।

डॉ. चौहान ने पूछा कि भारतीय कानून में बाल श्रम की परिभाषा क्या है और इसके दायरे में कितने साल तक के बच्चे आते हैं? बाल श्रम के खिलाफ दंड के क्या प्रावधान हैं? पूर्व श्रम आयुक्त अनुपम मलिक ने बताया कि अब 16 वर्ष तक के बच्चों को बाल श्रम कानून के दायरे में रखा गया है। पहले यह सीमा 14 वर्ष तक थी। 16 से 18 वर्ष के बच्चे किशोर वय से ऊपर के माने जाते हैं और उन्हें काम का प्रशिक्षण लेने की अनुमति दी गई है।18 वर्ष से ऊपर के बच्चों को वयस्क माना गया है।

उन्होंने बताया कि बाल श्रम पर अंकुश लगाने में सुप्रीम कोर्ट का बहुत बड़ा योगदान है। यदि कोई नियोक्ता 16 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग बच्चों से काम करवाता पकड़ा जाता है, तो बाल श्रम कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई के अतिरिक्त अतिरिक्त उसे ₹50000 का जुर्माना भी भुगतना होगाजो उस बच्चे के कल्याण के लिए बाल कल्याण कोष में जमा कराया जाएगा। इस कोष में सरकार भी अपनी तरफ से पैसे जमा करती है। बाल श्रम के मामलों की सूचना देने के लिए एक हेल्पलाइन नंबर 1098 भी जारी किया जा चुका है, जिस पर अपनी पहचान उजागर न करते हुए भी सूचना दी जा सकती है। इस नंबर से शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल कल्याण विभाग, पुलिस विभाग और श्रम विभाग जुड़े हुए हैं।

बाल श्रम और बढ़ा रहा गरीबी

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि अक्सर कहा जाता है ग़रीबी के कारण बाल श्रम होता है मगर विशेषज्ञ इसके विपरीत राय रखते हैं। अनुपम मलिक ने जोर देकर कहा कि बाल श्रम का कारण गरीबी नहीं, बल्कि यह एक धंधा बन गया है। बाल श्रम गरीबी के कारण नहीं, बल्कि कम खर्च में ज्यादा मुनाफा कमाने के उद्देश्य से कराया जा रहा है। बाल श्रम से गरीबी और बढ़ रही है क्योंकि एक बाल श्रमिक एक वयस्क की नौकरी छीनता है। बाल श्रम के खिलाफ अन्य देशों के मुकाबले भारत का कानूनी ढांचा कितना मजबूत है? डॉ. चौहान के इस सवाल पर मलिक ने कहा कि भारतीय कानून का स्तर किसी से कम नहीं है। पहले के मुकाबले अब कानून काफी सख्त हो गया है। किसी आरोपी के पकड़े जाने पर अब उसका कानून के फंदे से छूटना बहुत मुश्किल है। श्रम कानून का सूत्र वाक्य है -निर्दोष साबित होने से पहले तक आप दोषी हैं।

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इतिहास के पुनर्लेखन और शोधन पर हो तेज गति से काम :डॉ. चौहान

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तरावड़ी में प्रस्तावित शोध केंद्र दे सकता है इस कार्य को दिशा
सम्राट पृथ्वीराज चौहान जयंती पर विचार गोष्ठी

करनाल । भारतीय इतिहास के अनेक पक्ष शोधन और पुनर्लेखन की प्रतीक्षा में है। भारत के वामपंथियों और अनेक स्वार्थी विदेशी तत्वों ने हमारे इतिहास के साथ जमकर छेड़-छाड़ की। आज भी हमारी गौरवशाली दास्तानों के अनेक पन्ने और आयाम ऐसे हैं, जो आज तथ्यों और कल्पनाओं की भूलभुलैया में उलझे हुए महसूस किए जा सकते हैं। सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जयंती इस अधूरे पड़े कार्य को पूरा करने का संकल्प लेने का पावन अवसर है। हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जयंती के उपलक्ष्य में अकादमी द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए यह टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि अकादमी अध्यक्ष और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने करनाल के तरावड़ी में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की स्मृति में एक भव्य स्मारक एवं शोध केंद्र के निर्माण की घोषणा की हुई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सिरे चढ़ने से ना केवल तरावड़ी के एतिहासिक तत्वों का संरक्षण होगा बल्कि समूचे हरियाणा की शौर्य परंपरा पर व्यवस्थित शोध और लेखन का कार्य प्रारंभ हो सकेगा।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सेवानिवृत्त निदेशक डॉक्टर धर्मवीर शर्मा और क्षत्रीय इतिहास पर कार्य करने वाले बलबीर सिंह चौहान इस विचार गोष्ठी में बतौर वक्ता शामिल रहे। हरियाणा साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. पूर्ण मल गोड सहित अनेक विद्वानों की उपस्थिति में ऑनलाइन विचार गोष्ठी में तरावड़ी स्थित सम्राट पृथ्वीराज चौहान के क़िले के अवशेषों को संरक्षित करने के लिए नए सिरे से संगठित प्रयास करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा जो देश, समाज या संस्कृति अपने इतिहास को भूल जाता है और अपनी विरासत को संभाल कर नहीं रख पाता, ऐसे देश और संस्कृति का लुप्त हो जाना तय है। दुनिया ने ऐसे कई देशों और संस्कृतियों को मिटते देखा है जिन्होंने अपनी सभ्यता की विरासत को अगली पीढ़ी के लिए संजो कर नहीं रखा। विश्व मानचित्र पर ऐसे देशों का अब नामोनिशान भी बाकी नहीं है। श्रेष्ठ और उन्नत संस्कृति को जीवित दिखना भी चाहिए। इसके लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना अत्यंत आवश्यक है। सनातनी संस्कृति के महान पराक्रमी शासक चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने हरियाणा के तरावड़ी इलाके में कई लड़ाइयां लड़ी। उनके व्यक्तित्व एवं जीवन वृत्त की चर्चा आज और ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है।

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कोरोना से संग्राम में अग्रिम मोर्चे की योद्धा है आशा वर्कर: डॉ. चौहान

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संकट काल में हर घर तक छह बार पहुँच का दावा

करनाल। गांव में कोरोना संक्रमितों का डोर टू डोर सर्वेक्षण करना हो या होम आइसोलेशन में भेजे गए कोरोना मरीजों को दवाओं की किट पहुंचाने का काम, गर्भवती महिलाओं की जांच करानी हो या प्रसव के लिए उन्हें अस्पताल ले जाने का काम, नवजात बच्चों का टीकाकरण हो या डेंगू-मलेरिया से बचने के लिए गांव में स्प्रे कराने का काम, अपनी जान जोखिम में डालकर भी स्वास्थ्य के हर मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहने वाली मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकत्रियों को सेल्यूट तो बनता ही है।

कोरोना से संग्राम में अग्रिम मोर्चे की योद्धा है आशा वर्कर

सरकार द्वारा आमजन के लिए प्रदत्त स्वास्थ्य सुविधाओं को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण कड़ी का काम करने वाली इन आशा वर्करों को अपने काम के बदले कोई वेतन नहीं मिलता। जनसामान्य के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली इन मान्यता प्राप्त महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अद्भुत है।
हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में आशा वर्करों के कार्यों पर चर्चा के दौरान यह टिप्पणी की। उनके साथ चर्चा में शामिल थे करनाल के जिला आशा कोऑर्डिनेटर संजीव एवं आशा वर्कर कविता। डॉ. चौहान ने बताया कि प्रति एक हजार की आबादी वाले क्षेत्र के लिए एक आशा वर्कर की नियुक्ति की जाती है। इस समय करनाल जिले में 1142 आशा वर्कर कार्यरत हैं क़रीब 40 आशा वर्करों की रिक्तियां मौजूद हैं। कोरोना काल में सरकार की स्वास्थ्य सुविधाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाना आशा वर्करों की बदौलत ही संभव हो पाया है।
संजीव कुमार ने स्पष्ट किया कि कोरोना के दौरान 6 बार किए गए डोर टू डोर सर्वेक्षण में संक्रमण की स्थिति का पता लगाया गया और लक्षण वाले लोगों को जांच के लिए विभिन्न अस्पतालों में भेजा गया। आशा वर्करों ने होम आइसोलेशन में भेजे गए मरीजों को सरकारी दवाओं की किट पहुंचाने का काम भी किया। संजीव ने बताया कि सर्वेक्षण के लिए सरकार की ओर से एक मोबाइल ऐप तैयार किया गया है जिसे हर आशा वर्कर को दिया गया है। इस ऐप के जरिए संक्रमित मरीजों का डाटा दर्ज किया जाता है। कविता ने बताया कि कोरोना सर्वे के दौरान आशा वर्करों को सरकार की तरफ़ से मोबाइल फ़ोन,थर्मल स्कैनर व थर्मामीटर आदि दिए गए ।

गर्भावस्था और शिशु के जन्म के बाद करती है जच्चा-बच्चा की संभाल

जिला कोऑर्डिनेटर संजीव ने बताया कि अपने निर्धारित क्षेत्र में हर निवासी तक पहुंचना आशा कार्यकर्ताओं का दायित्व है। घर हो या डेरा, आशा वर्कर हर जगह जाकर लोगों के स्वास्थ्य का जायजा लेती हैं। उन्हें अपने क्षेत्र में हुए हर जन्म एवं मृत्यु का भी पंजीकरण करना पड़ता है।संजीव ने बताया कि कोरोना महामारी फैलने से पहले आशा वर्कर गांव की महिलाओं के स्वास्थ्य की देखभाल करती थीं। गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण करवाना, प्रसव पूर्व रक्तचाप, मधुमेह एवं एचआईवी आदि की जांच करवाना और मलेरिया एवं डेंगू से बचाव के लिए समय-समय पर गांव में दवा का छिड़काव कराना आशा वर्कर के दायित्वों में शामिल है। संजीव ने बताया कि गांव में गर्भवती महिलाओं की सूची बनाने, प्रसव से पूर्व तीन-चार बार चेकअप कराने, उनका अल्ट्रासाउंड कराने, प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं को अस्पताल लेकर जाने और डिलीवरी के बाद जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य का जायजा लेने के लिए आशा वर्करों को कम से कम 6 बार उनके घर जाना पड़ता है।इसके अलावा जच्चा से भी प्रसव बाद पेश आने वाली परेशानियों के बारे में पूछा जाता है। कोई परेशानी होने पर आशा वर्कर एंबुलेंस बुलाकर ऐसी महिलाओं को अस्पताल ले जाती हैं। कविता ने बताया कि बच्चे के जन्म के बाद से लेकर 5 वर्ष की उम्र होने तक आशा वर्करों को बच्चे की देखभाल करनी पड़ती है। उन्हें बच्चे के हर टीकाकरण के शेड्यूल का ध्यान रखना पड़ता है और बच्चे की मां को इसके लिए प्रेरित करना पड़ता है। जन्म के 1 महीने के बाद बीसीजी के टीके से लेकर 10 साल का होने तक बच्चों को टीके लगते रहते हैं। टीका लगने के बाद यदि बच्चे को बुखार आ जाए तो उसके स्वस्थ होने तक आशा वर्कर उसके स्वास्थ्य पर निगाह रखती हैं।

ऐसे नियुक्त होती है आशा वर्कर

आशा वर्करों की नियुक्ति प्रक्रिया क्या है और उनका मानदेय किस प्रकार तय किया जाता है? कुटेल निवासी एक प्रतिभागी के सवाल पर संजीव ने बताया कि गांव में एक वीएलसी कमेटी होती है जो आशा वर्करों का चयन करती है। किसी गांव में आशा वर्कर की जगह खाली हो तो सर्वप्रथम सरपंच की ओर से एक-दो दिन पहले इसकी मुनादी करा कर इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे जाते हैं। सरपंच ही इस तथ्य को अभिप्रमाणित करता है कि अभ्यर्थी उसके गांव की स्थाई निवासी है। आवेदन पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों को वीएलसी के पास भेजा जाता है। इस कमेटी में एएनएम के अलावा ब्लॉक आशा कोऑर्डिनेटर और प्रभारी मेडिकल अफसर (एमओ) शामिल होते हैं। एमओ तीन या चार लोगों की कमेटी गठित करता है जो अभ्यर्थी के दस्तावेजों के आधार पर उनकी अर्हता के अंक निर्धारित करती है।

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धर्मांतरण की प्रवृत्ति खतरनाक, समाज को करें जागरूक : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में गांव उपलाना पर चर्चा

करनाल। धर्मांतरण की प्रवृत्ति अत्यंत खतरनाक है। यह सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने का काम करता है जो देश में अशांति का मुख्य कारण है। देश के हर नागरिक को अपनी स्वेच्छा से किसी भी धर्म का पालन करने या उसे स्वीकार करने की आजादी है, लेकिन धोखे, पैसे के लालच या डर दिखाकर किसी का भी धर्मांतरण कराना कानूनन अपराध है।

धर्मांतरण के खिलाफ देश में पहले से कानून बने हुए हैं। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं कमोबेश देश के हर हिस्से में देखने-सुनने को मिलती हैं। इसलिए धर्मांतरण रोकने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है। इसके खिलाफ लोगों को जागरूक करना होगा और धैर्य के साथ कोई योजना बनानी होगी।

वार्ता का ऑडियो …..
म्हारे गाम की बात में आज बात उपलाना की
यूट्यूब पर देखें पूरा कार्यक्रम…….

ये विचार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में ग्रामीणों से चर्चा के दौरान व्यक्त किए। यह टिप्पणी उन्होंने उपलाना की वस्तुस्थिति पर चर्चा के दौरान की। कार्यक्रम में गांव उपलाना पर चर्चा के दौरान ग्रामीण सुनील दत्त ने बताया कि ईसाई ऐ मिशनरियों की गतिविधियां उप लाना सहित क्षेत्र में कई गांवों में बढ़ रही हैं। इसके चलते भविष्य में भी सामाजिक व क़ानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती है।

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ई- सिगरेट और हुक्का सिगरेट जितना ही खतरनाक : डॉ. राजेश

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में तंबाकू के दुष्प्रभावों पर चर्चा

करनाल। तंबाकू सिर्फ कैंसर ही नहीं फैलाता, बल्कि यह उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों का भी एक बड़ा और प्रमुख कारण है। विभिन्न वैज्ञानिक शोधों से अब यह बात साबित हो चुकी है कि तंबाकू में निकोटीन और डोपामिन के अलावा छह – सात हजार अन्य हानिकारक पदार्थ भी मौजूद होते हैं। इनमें 70% तत्व ऐसे हैं जो कैंसर का कारण बनते हैं। दुनिया भर में कैंसर के 25% मामलों के पीछे तंबाकू का ही हाथ है।

यह बात कल्पना चावला राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय के विशेषज्ञों डॉक्टर राजेश गर्ग और डॉक्टर विकास ढिल्लों ने विश्व तंबाकू निषेध दिवस के उपलक्ष्य में रेडियो ग्रामोदय की वेकअप करनाल कार्यक्रम शृंखला में हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान से चर्चा के दौरान कही। डॉ. चौहान ने कहा कि देश और दुनिया में तंबाकू उत्पादों का बढ़ता प्रचलन चिंता का विषय है। तंबाकू का सेवन हूँ सदियों से होता रहा है और हरियाणा के ग्रामीण अंचल में एक हुक्का आज भी ख़ासा प्रचलित है। आज हमें ग्रामीण अंचल के लोगों को यह समझाना होगा कि किसी ज़माने में किसी को समाज से बहिष्कृत करने के लिए भी उसका हुक्का-पानी बंद कर न देने की बात कही जाती थी आज वैज्ञानिक शोध के आधार पर ख़ुद हुक्के को अलविदा कहने का समय आ गया है।

कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राजेश गर्ग ने कहा कि तंबाकू को लेकर विश्व में कई युद्ध भी हो चुके हैं। तंबाकू लॉबी विश्व स्तर पर बहुत ताकतवर है। पिछली शताब्दी के दौरान लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि यह मानव शरीर के लिए कितना हानिकारक है। लेकिन आज नए-नए वैज्ञानिक अध्ययनों एवं शोध से यह बात सामने आ चुकी है कि तंबाकू कई प्रकार के कैंसर और सांस की बीमारी का प्रमुख कारण है। फेफड़े, त्वचा और मुंह के कैंसर में अक्सर तंबाकू का योगदान पाया जाता है। अब इसके हानिकारक रासायनिक तत्वों की पहचान कर ली गई है।डॉ. चौहान ने लोगों में फैली उस आम धारणा का जिक्र किया कि हुक्का ज्यादा नुकसानदेह नहीं है क्योंकि इसमें धुआं पानी से होकर गुजरता है। डॉ. राजेश गर्ग ने इस धारणा को पूरी तरह गलत बताते हुए कहा कि हुक्का भी सिगरेट के जितना ही नुकसानदेह है।

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. विकास ढिल्लो से पूछा कि तंबाकू या सिगरेट कैंसर के अलावा और क्या-क्या नुकसान पहुंचा सकता है? इस पर डॉ. ढिल्लो ने बताया कि बीड़ी एवं सिगरेट में निकोटीन और टार आदि हानिकारक तत्व पाए जाते हैं जिनमें मुख्य घटक निकोटीन है। यह मस्तिष्क के अंदर डोपामिन को सक्रिय करता है जो हमें फील गुड जैसी अनुभूति कराता है। डोपामिन हमारी रक्त धमनियों को सिकोड़ता है जिससे उच्च रक्तचाप और दिल की बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके खतरे का आकलन इस तरह से किया जा सकता है कि हर सिगरेट के साथ व्यक्ति को हृदय रोग होने की संभावना 5% बढ़ जाती है। सिगरेट क्रॉनिक लंग कंडीशन (सीओपीडी) को बढ़ावा देता है जो दुनिया में मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। कैंसर में भी यह ओरल कैविटी कैंसर, सांस की नली का कैंसर और फेफड़ों के कैंसर का कारण है।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे प्रवीण धनखड़ ने पूछा कि आखिर युवा तंबाकू की ओर इतने ज्यादा आकर्षित क्यों हो रहे हैं? क्या इसका कोई औषधीय या हर्बल इस्तेमाल भी है? इस पर डॉ. गर्ग ने कहा कि तंबाकू का कोई भी औषधीय इस्तेमाल अब तक सामने नहीं आया है।
देसी तंबाकू और फ्लेवर्ड तंबाकू में बुनियादी अंतर संबंधी प्रवीण के सवाल पर डॉ. गर्ग ने कहा कि हुक्का बार और ई-सिगरेट नए तरह का नशा है। इसमें एक द्रव्य पदार्थ होता है जिसे बैटरी के जरिए गर्म किया जाता है। इससे भाप निकलती है जिसे लोग सांस के जरिए अंदर खींचते हैं। इस भाप में भी तंबाकू के लगभग वही सारे कार्सिनोजेनिक तत्व मौजूद होते हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल गलत है कि ई-सिगरेट का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता।

चर्चा के दौरान प्रवीण धनखड़ ने डॉ. चौहान से पूछा कि तंबाकू व अन्य नशीले पदार्थों पर सरकार पूरी तरह प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देती और इस दिशा में क्या कर रही है? डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि तंबाकू समेत अन्य मादक पदार्थों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना व्यावहारिक रुप से अत्यंत कठिन है। पूर्व में ऐसे प्रयास सफल नहीं हो पाए। गुजरात और बिहार में शराब एवं अन्य मादक पदार्थों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा हुआ है। इसके बावजूद वहां अवैध शराब एवं नशाखोरी के मामले आते रहते हैं। समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो तंबाकू पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते ही बीड़ी मजदूरों के रोजगार का मुद्दा उठाने लगता है। इसलिए, यह काम समाज की जागरूकता से ही संभव है। डॉ. राजेश गर्ग ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि तंबाकू व्यवसाय से लाखों लोगों का व्यवसाय जुड़ा हुआ है और इसकी लॉबी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय अवसर पर बहुत मजबूत है। तंबाकू पर अचानक पूर्ण प्रतिबंध लगा देना शायद संभव नहीं है। समाज के अंदर ही इसका विकल्प ढूंढना होगा।

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विघटनकारी तत्वों के भरोसे ना छोडें राजनीति , कर्मठ को मौका दें

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रेडियो ग्रामोदय के ‘म्हारे गाम की बात’ कार्यक्रम में गांव राहड़ा पर चर्चा

 

असंध । देश और राज्यों का विकास एवं उनका सुचारू संचालन संस्थागत माध्यमों से ही संभव है। इस व्यवस्था का निर्माण राजनीतिक प्रणाली से ही हो सकता है। इसे इस तरह समझा जाए कि हमारे सामाजिक जीवन का नियमन और संचालन करने के लिए किसी ना किसी व्यवस्था का होना जरूरी है। व्यवस्थाहीन समाज को ही जंगलराज कहते हैं। इसलिए, उस व्यवस्था के निर्माण के लिए जो माध्यम विकसित हुआ उसे ही राजनीति कहते हैं। अच्छी शासन व्यवस्था और शांतिपूर्ण जीवन-यापन के लिए कर्मठ एवं इमानदार लोगों को आगे आना होगा। राजनीति में उनकी सख्त जरूरत है।

उपरोक्त विचार रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में राहडा के ग्रामीणों से चर्चा के दौरान हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने व्यक्त किए। डॉ. चौहान ने यह टिप्पणी सामाजिक कार्यकर्ता और कारोबारी नरेंद्र राणा के उस बयान पर की जिसमें उन्होंने राजनीति को गंदी चीज बताया था और इससे दूर रहने की बात कही थी।

डॉ. चौहान ने कहा कि गावों के विकास के लिए यह जरूरी है कि स्थानीय समस्याएं व आपसी विवाद आपस में ही मिल-बैठकर सुलझा लिए जाएं। आपसी विवाद का थाना-कचहरी तक जाना अच्छी बात नहीं। इससे आपसी सौहार्द और गांव की सामाजिक समरसता पर असर पड़ता है। चर्चा के एक प्रतिभागी शुभम राणा ने भी उनकी इस बात का समर्थन किया।

गांव राहडा की पृष्ठभूमि और वहां विकास की स्थिति पर चर्चा करते हुए नरेंद्र राणा ने कहा कि यह गांव कब बसा, इस संबंध में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस गांव में तीन पट्टियां हैं और यहां कई जातियों के लोग निवास करते हैं। ग्राम पंचायत का पिछला कार्यकाल संतोषजनक कहा जा सकता है। इस दौरान गांव में विकास के कई कार्य हुए। पाइपलाइन बिछाई गई, पेयजल के लिए मोटर भी लगाया गया। यह मोटर पिछले साल तक तो ठीक कार्य कर रहा था, लेकिन इस साल इसका संचालन सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा। गांव की कुछ गलियों के पुनर्निर्माण की जरूरत है।

गांव के कितने लोग सरकारी नौकरियों में हैं? डॉ. चौहान के इस सवाल पर टिंकू रोजड़ा ने बताया कि सरकारी नौकरियों में काम करने वाले उनके करीब 5-6 दोस्त पिछले पांच साल तक गांव में रहे। उन्होंने बताया कि गांव में 2 लोग ऐसे भी थे जो न्यायिक सेवा में जज के पद पर नियुक्त थे।

टिंकू रोजड़ा ने कहा कि गांव में पानी निकासी की समस्या है और सड़कें भी टूटी हुई हैं। इसके अलावा गांव का स्कूल भवन भी जर्जर अवस्था में है जिसका निर्माण करने की जरूरत है।

टिंकू ने बताया कि दो साल पहले गांव के एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर वीरेंद्र ने ग्रामवासियों का डेटाबेस तैयार करने की अभिनव पहल की थी और एक ऐप तैयार किया था जिसकी लॉन्चिंग खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने की थी। इस डेटाबेस में गांववासियों के बारे में संपूर्ण जानकारी उपलब्ध थी। मसलन, गांव का कौन सा व्यक्ति क्या व्यवसाय करता है, कहां तक पढ़ा लिखा है और उसका मोबाइल नंबर क्या है, उसका फोटो आदि। इसके अलावा इस ऐप में यह भी जानकारी थी कि गांव में कितने स्कूल, पेट्रोल पंप, आटा चक्की और नागरिक सुविधा के अन्य साधन उपलब्ध हैं। लेकिन कतिपय कारणों से यह आईडिया सिरे नहीं चढ़ पाया।

डॉ. चौहान ने पूछा कि गांव राहडा में सामूहिक प्रयास से सर्वप्रथम कौन सा कार्य करने की जरूरत है? इस पर टिंकू ने कहा कि गांव में फिलहाल एक श्मशान घाट की सख्त जरूरत है। इसके अलावा गांव को हरा-भरा बनाने के लिए पौधरोपण करने की भी जरूरत है।

डॉ चौहान ने कहा कि गांवों को साफ-सुथरा और हरा-भरा बनाए रखने के लिए सबको मिलकर प्रयास करना होगा। उन्होंने किसानों की समस्याओं को देखते हुए गांव में एक फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (एफपीओ) बनाने की सलाह दी ताकि कृषि उत्पादों के लिए विपणन की समस्या का समाधान हो सके।

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जौहड़ों से हटे अतिक्रमण, ईमानदार व्यक्ति को चुनें पंचायत प्रतिनिधि : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में  बाल-पबाना पर चर्चा

करनाल। हरियाणा के गावों में अधिकतर जौहड़ अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। सरकारी रिकॉर्ड में उनका जो आकार वर्णित है वह धरातल पर मौजूद नहीं है। जलाशयों पर यह अतिक्रमण जहां जलसंकट का कारण बन रहा है, वहीं इससे पानी निकासी की समस्या भी गंभीर हुई है। इसके परिणामस्वरूप नालियों का गंदा पानी गलियों व सड़कों पर फैलता है और राहगीरों को आने-जाने में परेशानी होती है। प्रदेश सरकार जौहड़ों को संरक्षित करने की दिशा में पुरज़ोर प्रयास कर रही है और इसके लिए हरियाणा तालाब प्राधिकरण गठित किया जा चुका है।

 रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में  बाल-पबाना गाँव से जुड़े मसलों पर ग्रामीणों से चर्चा के दौरान हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जलाशयों के स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का भी निर्देश है कि तालाबों का स्वरूप न बदला जाए। लेकिन आज स्थिति यह है कि अतिक्रमण के कारण गांवों में कहीं कहीं तो जौहडों को ढूंढना मुश्किल हो गया है। उन्होंने ग्रामवासियों को आगामी पंचायतीराज के चुनावों में पढ़े लिखे और ईमानदार जन प्रतिनिधि चुनने के लिए कहा जो दोनों ग्रामों की वर्तमान स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन की न केवल योजना बनाएँ बल्कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू भी करें।डॉक्टर चौहान ने कहा कि गाँव के विकास कार्यों में अनियमितता के जो मामले जाँच के अधीन हैं उन में दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों को क़ानून सम्मत तरीक़े से दंडित किया जाएगा।

म्हारे गाम की बात…@ रेडियो ग्रामोदय 90.4

चर्चा के दौरान गांव पबाना के समाजसेवी विशाल विलवस ने बताया कि पबाना हसनपुर गांव में विकास की स्थिति संतोषजनक है। दसवीं तक के स्कूल हैं ।पीने के पानी के लिए तीन नलकूपों की भी व्यवस्था है। गांव में अस्पताल के लिए अपना स्थाई भवन है। ग्राम सचिवालय की इमारत अभी निर्माणाधीन है। उन्होंने कहा कि गाँव में स्टेडियम के लिए बजट स्वीकृत होने की जानकारी मिली है और इसके बाद ग्रामवासी इस पर काम शुरू होने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं।

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने प्रतिभागियों से ही दोनों गांवों के विकास की वर्तमान स्थिति और भविष्य की योजनाओं पर खुलकर विमर्श किया।इस पर गांव पबाना-हसनपुर के शिक्षक नरेश प्रजापति ने बताया कि गांव में विकास की स्थिति पहले की तुलना में काफ़ी अच्छी है। वहां सभी समुदायों के बीच आपसी भाईचारा बना हुआ है। नरेश ने गांव में स्थित सरकारी स्कूल के सामने गंदगी फैले होने का जिक्र किया और कहा कि इस पर ध्यान देने की जरूरत है। इस पर डॉ. चौहान ने कहा कि स्वच्छता वैसे तो स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन गांव वासियों को भी अपने स्तर पर पहल करनी चाहिए।

बाल राजपूतान के रणदीप सिंह ने भी गांव में पानी निकासी की समस्या की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि पानी की निकासी न होने के कारण सड़कों पर गंदा पानी फैला रहता है। इस पर डॉ. चौहान ने कहा कि पानी निकासी की समस्या जौहड़ों से कब्जे हटाने के बाद ही दूर हो सकती है।

डॉ. चौहान ने जब सरकारी नौकरियों के मामले में दोनों गांवों की हिस्सेदारी के संबंध में जानना चाहा तो नरेश प्रजापति ने बताया  कि सरकारी नौकरियों के मामले में पबाना-हसनपुर की हिस्सेदारी नाम मात्र की ही है। कई साल पहले गांव में सेना के दो कर्नल निवास करते थे, लेकिन अब वे गांव से बाहर जा चुके हैं। रणदीप सिंह ने बताया कि गांव के सरकारी स्कूल की पढ़ाई तो अच्छी है, लेकिन खेलों के मामले में गांव के बच्चों की कोई खास उपलब्धि नहीं है।

बाल पबाना के लिए जल्द शुरू होगा शैक्षणिक प्रोजेक्ट

चर्चा के दौरान कई ग्रामीणों ने गांव के बच्चों के लिए कोचिंग सेंटर खोलने की जरूरत बताई ताकि उन्हें करियर बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके और ख़ासकर सरकारी नौकरियों में गाँव की हिस्सेदारी बढ़े। नरेश प्रजापति ने कहा कि गांव में मेडिकल की पढ़ाई के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। विशाल विलवस  ने भी कहा कि गांव के बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। यह मार्गदर्शन बिना कोचिंग सेंटर खोले नहीं हो सकता। इस पर डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि दोनों गांवों में ग्रामोदय समितियों का गठन कर जल्द ग्रामोदय अभियान की ओर से ऑनलाइन करियर काउंसलिंग केंद्र से शुरू किया जाएगा।

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शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा व्यापार नहीं, पेटेंट फ्री हो कोरोना वैक्सीन : सतीश

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में पेटेंट फ्री कोरोना वैक्सीन अभियान पर चर्चा

करनाल। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा व्यापार के विषय नहीं हो सकते। भारतीय जीवन दर्शन यही कहता है। इन दोनों क्षेत्रों से जुड़ी वस्तुओं पर पूरी मानव जाति का अधिकार है। इसलिए इन्हें पेटेंट के दायरे से मुक्त रखना होगा। कोरोना महामारी से विश्व भर में हो रही लाखों लोगों की मौत के बावजूद इसकी रोकथाम के लिए अब तक विकसित दवाओं व वैक्सीन के उत्पादन को पेटेंट की जंजीरों से जकड़ कर रखना और अपने व्यावसायिक फायदे के लिए लोगों की मौत को चुपचाप देखते रहना सर्वथा अनुचित है और निंदनीय भी। यह संपूर्ण मानव जाति के प्रति अपराध है। भारत के स्वदेशी जागरण मंच ने कोरोना वैक्सीन व दवाओं को पेटेंट के नियंत्रण से मुक्त रखने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान छेड़ा है जिससे सभी लोगों को जुड़ना चाहिए।

उपरोक्त विचार रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह संगठक सतीश कुमार के साथ हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान की चर्चा के दौरान उभर कर सामने आए। सतीश कुमार गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर भगवती प्रसाद के साथ कोरोना से संग्राम से जुड़े विभिन्न पक्षों पर इस शोध पूर्वक तैयार की गई एक पुस्तक के सह लेखक भी हैं।
इस अवसर पर डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा की कोरोना महामारी के दौरान वैक्सीन व आवश्यक दवाएं न मिलने के कारण विश्व भर में लोग दम तोड़ रहे हैं। इसका समाधान यथाशीघ्र निकलना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संगठक सतीश कुमार ने कहा कि किसी भी परिस्थिति में सिर्फ अपना व्यवसायिक फायदा देखना विदेशी सोच है। । शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी ये कंपनियां अपनी बौद्धिक संपदा का सर्वाधिकार सुरक्षित रखना चाहती हैं। लेकिन वैश्विक महामारी के दौर में जीवन रक्षक दवाओं और वैक्सीन को पेटेंट से मुक्त रखना ही होगा।

सतीश ने बताया कि विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का गठन बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के लिए ही किया गया था। लेकिन वर्ष 2001 के दोहा में आयोजित ट्रिप्स सम्मेलन में भारत ने यह बात मनवा ली थी कि सामान्य परिस्थितियों में तो पेटेंट कानून लागू होगा, लेकिन वैश्विक महामारी के समय में बौद्धिक संपदा को विश्व के सभी देशों के लिए खुला रखना होगा ताकि वह भी इसका लाभ उठा सकें। पिछले एक वर्ष के भीतर विश्व भर में कोरोना की अब तक मुख्यतः आठ वैक्सीन ही विकसित हो पाई हैं। इस समय विश्व भर में 1200 करोड़ वैक्सीन की जरूरत है, लेकिन इन कंपनियों की क्षमता 100 करोड़ से ज्यादा उत्पादन करने की नहीं है। पिछले 5 महीने के दौरान सिर्फ 170 करोड़ वैक्सीन का ही उत्पादन हो पाया है। सतीश कुमार ने सवाल उठाया कि यदि उत्पादन की गति यही रही तो दुनिया की 738 करोड़ आबादी को वैक्सीन देने में चार साल लगेंगे। तो क्या तब तक लाखों लोगों को मरने देंगे?

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने विश्व भर में कोरोना वैक्सीनेशन की अद्यतन स्थिति के बारे में पूछा तो सतीश कुमार ने बताया कि वि अमेरिका में 75 फ़ीसदी वयस्क लोगों को वैक्सीन दी गई है तो यूरोपीय देशों में यह आंकड़ा 60% के करीब है। दूसरी तरफ 52 अफ्रीकी देशों में अब तक सिर्फ दो फ़ीसदी वयस्क लोगों को ही वैक्सीन लगाई गई है। भारत ने कोरोना की स्वदेशी वैक्सीन विकसित की है, इसलिए हम अपेक्षाकृत ज्यादा वैक्सीन लगा पाए।

चर्चा के दौरान डॉ. चौहान ने कहा कि विश्व भर में कोरोना के कारण अपनी जान गवाने वाले लोगों की सूची में भारत 15वें स्थान पर है। वैक्सीनेशन की गति में भी हम विश्व के अन्य देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं। इसके बावजूद देश के ही कुछ लोग दुनिया में भारत और भारतीय सरकार की छवि खराब करने के प्रयास में लगे हैं।

डॉ. चौहान की बात का समर्थन करते हुए सतीश कुमार ने कहा कि प्रति दस लाख की आबादी के हिसाब से अमेरिका में 1.2 लाख लोगों को कोरोना संक्रमण हुआ जबकि इसके मुकाबले भारत में सिर्फ 18000 लोग संक्रमित हुए। इसी प्रकार अमेरिका में प्रति दस लाख की आबादी पर 1870 लोग कोरोना से मरे। भारत में यह आंकड़ा 215 लोगों का रहा जबकि भारत की आबादी 138 करोड़ के करीब मानी जा रही है। सतीश कुमार ने बताया कि संक्रमितों के मामले में भी भारत की स्थिति यूरोपीय देशों से बेहतर रही है। अमेरिका में 600 शव अंत्येष्टि के लिए स्थान के इंतजार में अभी भी रखे हुए हैं। भारत में कोरोना की दूसरी लहर इतनी तेजी से आई जिसका किसी को भी पूर्वानुमान नहीं था। इसीलिए इसे संभालने में हमें 15 दिन लग गए।

पेटेंट फ्री अभियान से जुड़ें

सतीश कुमार ने बताया कि देश और दुनिया के कम से कम 20 लाख लोगों को पेटेंट मुक्त वैक्सीन अभियान से जोड़ने के लिए स्वदेशी जागरण मंच ने एक अभियान छेड़ा है। इसके तहत लोगों से ऑनलाइन जुड़ने और अपना डिजिटल हस्ताक्षर करने की अपील की जा रही है। इसके लिए joinswadeshi.com नाम से एक वेबसाइट लिंक जारी किया गया है। इसके अलावा एक पुस्तक भी लिखी गई है जिसका विमोचन होना बाकी है। पुस्तक में महामारियों का इतिहास, चीन के वुहान शहर से कोरोना विश्व भर में कैसे फैला, भारत ने इसकी रोकथाम के लिए क्या-क्या पूर्व तैयारियां कीं – इन बातों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

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नीलोखेड़ी के सवालों का हल निकालना होगा : डॉ. चौहान

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शहर की समस्याओं पर वेकअप करनाल में खुली चर्चा
सांसद और विधायक के बीच बेहतरीन तालमेल की माँग

करनाल। देश विभाजन के बाद बसाया गया नीलोखेड़ी आज तक विकास के मामले में ऊँचाइयों को नहीं छू पाया जो उसकी स्थापना के समय सोची विचारी गई थी। कई बार भी विपक्ष के प्रतिनिधि को विधायक चुनकर भेजने के कारण शायद यह स्थिति रही, मगर यह इकलौता कारण नहीं हो सकता।इसे चंडीगढ़ की तर्ज पर बसाने की बात कही गई थी और शुरुआती दौर में स्वयं पंडित नेहरू प्रधानमंत्री होते हुए दो बार यहाँ आए भी। मगर इस नगरी के भाग्य शायद चंडीगढ़ सरीखा बनाना नहीं था। एक बार नीलोखेड़ी को हरियाणा की नई राजधानी के रूप में विकसित करने की बात भी चली मगर वह भी सिरे नहीं चढ़ पाई।परिणाम यह है कि यह शहर मात्र एक-सवा किलोमीटर के दायरे में ही सिमट कर रह गया है।

उपरोक्त विचार-बिंदु रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में नीलोखेड़ी की समस्याओं पर स्थानीय निवासियों से हरियाणा ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान की बातचीत के दौरान उभरकर सामने आए। डॉ. चौहान ने कहा कि राज्य की मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने प्रदेश के हर जिले के विकास के लिए धन का समान रूप से आवंटन किया और धन की कहीं कमी नहीं आने दी। इसके बावजूद नीलोखेड़ी के लोगों की कुछ आकांक्षाएं अभी अधूरी है। उन्होंने कहा कि नीलोखेड़ी को सबडिवीजन बनाना विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण साबित होगा और इस दिशा में औपचारिकताएं तेज गति से पूर्ण की जा रही है। उन्होंने कहा कि शहर में बस स्टेण्ड की पुरानी माँग को भी यथाशीघ्र पूरा किया जाना सरकार की प्राथमिकताओं में शुमार है और इसके रास्ते में खड़ी बाधाओं को जल्द दूर किया जाएगा।यह दोनों ही मामले करनाल के सांसद और नीलोखेड़ी के विधायक द्वारा में समुचित तरीक़े से आगे बढ़ायी जा रहे हैं।

चर्चा में जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और भाजपा नेता शिवनाथ कपूर ने बताया कि आज से 32 साल पहले कुछ समस्याएं जहाँ मौजूद थीं, वह आज भी हैं। उन्होंने नीलोखेड़ी में कोरोना संक्रमण की स्थिति की जानकारी देते हुए कहा कि शहर में कोरोना के 100 पुष्ट मामले अस्पताल में उपचाराधीन हैं। शिवनाथ कपूर ने बताया कि नीलोखेड़ी के अस्पताल में 12 अतिरिक्त ऑक्सीजन बेड की व्यवस्था की गई है जिनमें 6 मरीज भर्ती हैं। इसके अलावा नीलोखेड़ी में 100 बिस्तरों वाला एक नया अस्पताल भी बनने जा रहा है।

चर्चा के दौरान एक विकास ने लॉकडाउन के दौरान छोटे दुकानदारों को पेश आने वाले आर्थिक संकट की ओर ध्यान दिलाया। इस पर डॉ. चौहान ने कहा कि दुकानदारों की समस्या से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रदेश सरकार ने लॉकडाउन को यथासंभव टालने की कोशिश की, लेकिन परिस्थितियों ने ऐसा नहीं होने दिया। यह मजबूरी का फैसला है। जीवन बचाना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। जब जीवन ही नहीं बचेगा तो दुकानदार रोजगार कैसे करेगा?

समाजसेवी पंकज शर्मा ने बताया कि कोरोना काल में सामाजिक संगठन भी अपना योगदान दे रहे हैं। नीलोखेड़ी के रक्तदाता परिवार आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की मदद कर रहे हैं।

मस्कट से चर्चा में जुड़े दीपक शर्मा ने कहा कि करनाल के सांसद संजय और विधायक धर्मपाल के अंदर गोंदर परस्पर अधिक तालमेल के साथ कार्य करें तो अधर में लटके इस क्षेत्र के अनेक कार्य तेज गति से सिरे चढ़ सकते हैं।इस पर शिवनाथ कपूर ने कहा कि पूर्व विधायक भगवान दास कबीरपंथी ने भी क्षेत्र के विकास के लिए भरपूर परिश्रम किया।

युवा सामाजिक कार्यकर्ता योगी गाबा ने वैक्सीनेशन के लिए आवंटित स्लॉट के अनुसार टीकाकरण न होने का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि टीकाकरण के लिए निर्धारित समय पर वैक्सीन नहीं लग पाता और उन्हें टीकाकरण के लिए इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने सब डिवीज़न बनाने के साथ साथ बस अड्डे की माँग को भी जल्द पूरा किए जाने की बात कही। आशीष सिधवानी ने रोज़गार के नए अवसरों की व्यवस्था करने तथा केन्द्रीय प्रेस परिसर की 35 एकड़ भूमि का सदुपयोग किए जाने की माँग उठायी।

चर्चा में शिवनाथ कपूर, पंकज शर्मा, योगी गाबा, दीपक शर्मा और विकास के अलावा आशीष, अजय वर्मा, पारस खुराना और गुलाब सिंह पोसवाल ने भी भाग लिया।

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