ग्रामोदय

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परिवार और समाज की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सभी टीकाकरण के लिए आगे आएं

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कोरोना की महामारी को मात देने के लिए आवश्यक है कि 18 साल से ऊपर के प्रत्येक नागरिक का टीकाकरण हो। जो लोग किसी भ्रम अथवा भय के कारण पात्र होते हुए भी अब तक टीका लगवाने से रह गए हैं, उन्हें न केवल अपनी अपितु अपने परिवार और समाज की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी टीकाकरण के लिए आगे आना चाहिए। रेडियो ग्रामोदय के संस्थापक और हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय और यूनिसेफ द्वारा टीकाकरण जागरूकता के लिए चलाए जा रहे अभियान के अंतर्गत गोंदर के रणजीत नगर स्थित कॉलोनी में ग्राम वासियों को संबोधित करते हुए यह बात कही।

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि भारत में कोरोना के टीके को लेकर कुछ लोग निहित स्वार्थ के कारण तमाम तरह की भ्रांतियां फैला रहे हैं किंतु ऐसे तत्वों की साजिशों को कामयाब होने नहीं दिया जाएगा। इस अवसर पर उन्होंने टीका लगवा चुके ग्रामवासियों से कोरोना के टीके को लेकर उनके अनुभव विस्तार से सुने। जो लोग टीका लगवा चुके उन्होंने टीका क्या सोचकर लगवाया है और टीका लगवाने के बाद किस का अनुभव कैसा रहा, कार्यक्रम में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। इसके साथ साथ जिन्होंने अब तक टीका नहीं लगाया है उन्होंने इस कार्यक्रम में टीका ना लगवाने की अपनी-अपनी वजह भी अभिव्यक्त की।

डॉ. चौहान ने कहा कि टीका लगने के बाद कुछ लोगों को हल्का फुल्का बुखार आता है जो सामान्य और स्वाभाविक बात है। उन्होंने कहा कि कोरोना से पहले अलग-अलग बीमा से बचाव के जोडी के स्वाभाविक रूप से हम सब अपने बच्चों को लगवादे रहे हैं, उनके मामले में भी इस तरह के लक्षण आते रहे है। डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि भारत में उपलब्ध 3 कोरोना टीके अलग-अलग प्रक्रिया से अलग-अलग निर्माता कंपनियों ने बनाए हैं इसलिए उनके काम करने के तरीके भिन्न भिन्न है। कोवीशील्ड और कोवैक्सीन के दो टीके लगवाने पड़ते हैं। दोनों वैक्सीन के मामले में दो टीमों के बीच की अवधि अलग-अलग है। इनके विपरीत रूस से मंगाया गया स्पूतनिक टीका एक ही बार लगता है।

ग्रामवासियों को डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने स्पष्ट बताया की कोविड के टीकाकरण का सारा कार्य अब केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित व संचालित किया जा रहा है। सरकारी टीकाकरण केंद्रों पर टीका लगवाने के लिए किसी भी नागरिक को एक भी पैसा खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि देशभर में टीकाकरण अभियान दिनों दिन तेजी पकड़ रहा है। उन्होंने कहा टीकाकरण को लेकर यदि ग्रामवासियों के मनों में कोई संदेह अथवा सवाल हैं तो वे रेडियो ग्रामोदय की हेल्पलाइन 8816904904 पर कॉल कर सलाह ले सकते हैं। डॉ. चौहान ने कोरोना संबंधी जागरूकता और विशेषकर टीकाकरण के कार्यक्रम में मदद के लिए आगे आने वाले सामाजिक संगठनों प्रशंसा की और कहा कि समाज और देश पर जब-जब कोई आपदा आए तो सब लोगों को परस्पर मतभेदों को भुलाकर एकजुटता के साथ कार्य करना चाहिए।

इस अवसर पर भाजपा नेता वेद तनेजा, सुभाष कुमार, राम निवास, सुखबीर, नाथीराम, सतपाल, धरमपाल, वीरभान, बागड़ी, राजेश, जीतराम, शिव कुमार, काला, अंग्रेज, संजीव, नरेश, अशोक, भूरा व अन्य ग्रामीण उपस्थित रहे ।

शराब का सेवन कोरोना से नहीं बचाता

कार्यक्रम के दौरान एक श्रमिक ने कहा कि उसने कोरोना का टीका लगवाना इसलिए जरूरी नहीं समझा क्योंकि वह हर रोज शराब पी लेता है और उसकी मान्यता है कि शराब के सेवन से कोरोना का वायरस मर जाता है। श्रमिक का कहना था कि जब सैनिटाइजर में मौजूद शराब से वायरस मर जाता है शराब के सेवन से कोरोना से बचाव होना चाहिए।बहुत गंभीरता के साथ की गई ग्रामवासी की इस टिप्पणी पर कार्यक्रम में उपस्थित अधिकांश लोग खुलकर हंसे। डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि शराब पीने वाले को कोरोना नहीं होगा, यह एक खतरनाक भ्रांति और मूर्खतापूर्ण सोच है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय के विशेषज्ञ बारंबार इस बारे में स्पष्ट कर चुके हैं कि मदिरापान कोरोना से बचाव का कवच नहीं। डॉ. चौहान ने कहा कि शराब पीना वैसे भी सेहत के लिए घातक है और कोरोना से बचाव का मदिरापान से कोई संबंध नही।

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रेडियो ग्रामोदय व यूनिसेफ द्वारा वैक्सीनेशन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

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अफवाहों से बचें, संदेह दूर करें और वैक्सीनेशन लगवाएं : डॉ चौहान

निसिंग। दो गज दूरी, मास्क और सैनिटाइजेशन के साथ कोविड रोधी वैक्सीन लगवा कर स्वयं को कोविड के विरुद्ध चल रहे इस महासमर में ज्यादा मजबूत बनाएं। विश्व स्तर पर हुए अध्ययन स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि वैक्सीन लगवाना कोविड की रोकथाम में अत्यंत कारगर सिद्ध हुआ है । कोरोना के विस्तार को रोकने में सैनिटाइजेशन , मास्क, दो गज दूरी और वैक्सीनेशन अत्यंत कारगर सिद्ध हुए हैं । रेडियो ग्रामोदय और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में ग्रामोदय भवन, गोंदर में आयोजित कोविड रोधी जागरूकता कार्यक्रम के दौरान ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष और प्रदेश भाजपा प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने यह टिप्पणी की।

कार्यक्रम में कोविड प्रोटोकॉल के अनुरूप मास्क और दूरी का अनुपालन करते हुए उपस्थित ग्रामीणों व गणमान्य व्यक्तियों को रेडियो ग्रामोदय की ओर से वैक्सीनेशन तथा कोविड रोधी विभिन्न उपायों के प्रति जानकारी प्रदान की गई। रेडियो ग्रामोदय के अधिकारियों ने ग्रामीणों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों का सरकार व यूनिसेफ द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप उत्तर दिया और सभी का आह्वान किया कि बिना किसी संदेह के वैक्सीन अवश्य लगवाएं। वैक्सीनेशन को लेकर मन में कोई संदेह ना पालें तथा एक जागरूक नागरिक की तरह कोविड रोधी प्रोटोकॉल का अनुपालन करें।

रेडियो ग्रामोदय के संयोजक शिवम राणा के ‘जागरूक हम, तो कोरोना खत्म’ के उद्घोष से कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर हिसम सिंह, पोखर त्यागी, विशाल त्यागी, नानक, अशोक, राजकुमार, आयुष, अमन, दीपक, दीपेंद्र, संगम व अन्य ग्रामवासी मौजूद रहे।

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योग प्राचीनतम भारतीय विद्या : डॉ. चौहान

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असंध के नगरपालिका पार्क में चलने वाली महिला योग कक्षा में योगाभ्यासियों एवं योग शिक्षकों को संबोधन

असंध। योग प्राचीनतम भारतीय विद्या है जो पूर्णत: शरीर विज्ञान पर आधारित है। शरीर का सिर्फ व्याधियों से मुक्त होना ही संपूर्ण स्वास्थ्य नहीं है। शरीर के साथ-साथ मन-मस्तिष्क और आत्मा का भी स्वस्थ होना उतना ही जरूरी है। इन तीनों के स्वस्थ हुए बिना मनुष्य को पूर्णत: स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। जीवन का यह गूढ़ ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले दे दिया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे अब जाकर माना है। भारतीय संस्कृति एवं जीवन दर्शन में छिपे ज्ञान के अनमोल भंडार को हमें फिर से ढूंढ कर उस पर अमल करना होगा। उपरोक्त विचार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भाजपा प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने व्यक्त किए। वह असंध की पतंजलि योग समिति द्वारा नगरपालिका पार्क में चलाई जा रही महिला योग कक्षा के योगाभ्यासियों एवं योग शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे।

डॉ. चौहान ने कहा कि आधुनिकता की होड़ और पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण में हम अपनी अनमोल प्राचीन भारतीय विद्या एवं सांस्कृतिक विरासत को भूल बैठे थे। राजनीति की संकीर्ण सोच ने भी प्राचीन भारतीय विद्या का निरादर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन ऐसे माहौल में भी योग गुरु बाबा रामदेव जैसे लोग मौजूद हैं जिन्होंने लुप्त होती जा रही भारतीय विरासत को पुनर्जीवित कर योग को घर-घर और विश्व भर में पहुंचाया। योग को वैश्विक पहचान दिलाने में बाबा रामदेव का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।

ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी योग को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपनी करिश्माई नेतृत्व क्षमता से पूरे विश्व को योग की परिधि में लाने का काम किया है। यह भारत की नए अंदाज की राजनीति की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रतीक है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकांश देश अब हर साल योग दिवस मनाते हैं । उन्होंने कहा की योग के नियमित अभ्यासी सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य को ही बढ़ावा नहीं दे रहे, बल्कि वह विभिन्न बीमारियों पर हर साल होने वाले अरबों रुपए के खर्च को भी बचा रहे हैं। कोरोना काल में योग के गुणकारी तत्वों को सबने देखा और महसूस किया है। इसकी महत्ता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि योग अब आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भी शामिल होता जा रहा है। इस अवसर पर डॉ. चौहान ने महिलाओं के लिए योग कक्षा के संचालन के लिए पतंजलि योग समिति का आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पतंजलि योग समिति की असंध इकाई के संरक्षक मायाराम शास्त्री एवं समिति के प्रभारी एडवोकेट नरेंद्र शर्मा ने की। इस अवसर पर महिला पतंजलि प्रभारी सुनीता गोयल, योग शिक्षिका किरण भी उपस्थित रहे ।

भारतीय कालगणना विश्व की प्राचीनतम कालगणना

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि भारतीय कालगणना संसार की सबसे प्राचीन वैज्ञानिक कालगणना है। कालगणना समेत भारतीय संस्कृति की अनेक ऐसी धरोहर हैं जो देश की मातृशक्ति की बदौलत आज भी जीवित हैं। डॉ. चौहान ने मातृशक्ति को नमन करते हुए उनका आह्वान किया कि वे भारतीय कालगणना पद्धति को कदापि ना भूलें। अपने घरों में देसी कैलेंडर अवश्य रखें और बच्चों के सामने देसी तिथियों की चर्चा अवश्य करें। आज के बच्चे ही कल के देश के कर्णधार हैं। उन्हें भारत की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू कराना अत्यंत जरूरी है।

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वैकल्पिक फसलों की हो खेती : डॉ. चौहान

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वेक अप करनाल में ग्राउंड वाटर संरक्षण पर चर्चा

करनाल। पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को बचाने के लिए भू-जल का संरक्षण बहुत जरूरी है। जमीन के नीचे स्थित इस जलसंपदा को बचाने के लिए हमें इसका दोहन सीमित करना होगा। भूजल का दोहन कम करने के अनेक उपायों में कृषि और बागवानी भी एक है। हमें अपनी खेती करने के अंदाज को बदलना होगा। धान की फसल उपजाने में ग्राउंड वाटर की बड़ी मात्रा का दोहन होता है। एक अनुमान के अनुसार 1 किलो धान के उत्पादन में 4000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसके कारण करनाल जिले के गांवों में भूजल का स्तर घटकर अब 100 से 120 फीट नीचे चला गया है। पहले या स्तर जमीन से सिर्फ 30 फीट नीचे हुआ करता था। यह घटता भूजल स्तर चिंता का विषय है। इसलिए किसानों को अब ध्यान से अन्य फसलों की ओर जाना होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर हरियाणा सरकार ने 3 साल पहले मेरा पानी मेरी विरासत योजना शुरू की थी जिसके तहत कई प्रावधान किए गए हैं।

उपरोक्त टिप्पणी हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम वेकअप करनाल में असंध के कृषि विकास अधिकारी डॉ. राधेश्याम से चर्चा के दौरान की। मेरा पानी मेरी विरासत योजना को धरातल पर उतारने में पेश आ रही समस्याओं पर चर्चा करते हुए डॉ. राधेश्याम ने बताया कि पहले इस योजना को जलशक्ति अभियान के नाम से किसानों के बीच प्रचारित किया गया था। ब्लॉक एवं जिला स्तर पर किसान कैंप लगाकर किसानों को जागरूक किया गया कि एक किलो धान का उत्पादन करने में औसतन 4000 लीटर पानी खर्च होता है जबकि इसकी वैकल्पिक फसल मक्की के उत्पादन में मात्र 800 लीटर पानी की खपत होती है। इसलिए किसानों को वैकल्पिक फसलों की बिजाई पर ध्यान देना चाहिए। डॉ राधेश्याम ने बताया की वैकल्पिक फसलों में मक्की, बाजरा, कपास, मूंग, उड़द, तिल आदि शामिल हैं।

वेक अप करनाल

डॉ. चौहान ने बताया कि किसानों को जागरूक करने के सुपरिणाम सामने आए। इस योजना के तहत हरियाणा में करीब एक लाख एकड़ भूमि धान मुक्त हो गई। धान न बोने वाले किसानों के खाते में प्रदेश सरकार ने 52 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि डाली। अब सरकार का लक्ष्य दो लाख एकड़ भूमि को धान उत्पादन से मुक्त करने का है। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ राधेश्याम ने बताया कि पहले मक्की के खरीदारों का अभाव था। इसे दूर करने के लिए सरकार ने वैकल्पिक फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया और फसलों के खरीदार भी तैयार किए। इसका नतीजा यह हुआ कि हरियाणा के 15 जिलों में करीब 15 सौ एकड़ भूमि में किसानों ने मक्की की फसल उपजाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरा पानी मेरी विरासत योजना के तहत सरकारी पोर्टल पर अपनी फसलों का पंजीकरण कराने वाले किसानों की ही फसल सरकार द्वारा खरीदी गई।

डॉ. राधेश्याम ने बताया कि धान के वैकल्पिक फसलों के उत्पादन के लिए विभाग को पूरे करनाल जिले के लिए 8700 एकड़ भूमि का लक्ष्य दिया गया है। फसलों का पंजीकरण कराने में उपलाना का स्थान सबसे ऊपर है। पंजीकरण की अंतिम तिथि 25 जून है। उन्होंने बताया की सरकार ने वैकल्पिक फसलों में चारे के उत्पादन को भी शामिल किया है। चारा उपजाने वाले किसानों को सरकार ₹7000 के हिसाब से पैसे देगी। इसके अलावा वैकल्पिक फसलों का बीमा कराने के लिए प्रीमियम का खर्चा भी सरकार की ओर से वहन किया जाएगा।

इस अवसर पर डॉ चौहान ने बताया की फसलों की चॉइस को बदलने के लिए हरियाणा सरकार ने वर्ष 2030 तक के लिए एक बागवानी विजन तैयार किया है। बागवानी विजन में भावांतर भरपाई योजना के तहत इस बार 23 फसलों को शामिल किया गया है जिनमें 14 सब्जियां भी शामिल हैं। इस योजना के तहत 21 फसलों के संरक्षित मूल्य निर्धारित किए गए हैं। साथ ही यह प्रावधान भी किया गया है कि यदि भावांतर भरपाई योजना में शामिल फल व सब्जियों की पूरी फसल प्राकृतिक आपदा के कारण नष्ट हो जाती है तो उसके पूरे खर्च की भरपाई मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना के अंतर्गत की जाएगी। इसके तहत किसानों को ₹30000 प्रति एकड़ के हिसाब से क्लेम मिलेगा। फलों के मामले में भरपाई की यह दर ₹40000 प्रति एकड़ होगी। इस बीमा योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को 2.5% राशि का भुगतान करना होगा।

डॉ चौहान ने बताया कि मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने किसानों के लिए एक और योजना शुरू की है। इसके तहत यदि कोई किसान 1 एकड़ क्षेत्र में 400 पौधे लगाता है तो उसे अगले 3 साल तक प्रदेश सरकार प्रति एकड़ ₹10000 देगी। यह भी जल संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया है। उन्होंने बताया कि इस बार वैकल्पिक फसलों की सूची से बाजरा को हटा लिया गया है।

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आर्यों ने ही बसाई थी हड़प्पा संस्कृति, उनके विदेशी होने की बात गलत : धुम्मन

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में सरस्वती नदी के ऐतिहासिक व वैज्ञानिक तथ्यों पर चर्चा

https://www.youtube.com/watch?v=HVXAGsBp2Y4

करनाल। पुराणों में वर्णित सरस्वती नदी कोई कपोल कल्पना नहीं, बल्कि एक सच्चाई थी। इस नदी के मूर्त रूप में सतह के ऊपर बहने से लेकर इसके अंतर्ध्यान होकर भूगर्भ में प्रवाहित होने तक के अब पर्याप्त पुरातात्विक एवं वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। वैदिक काल में सरस्वती नदी आदिबद्री के पास स्थित बंदर पुच्छ ग्लेशियर से अवतरित होकर राजस्थान की तरफ बहती थी। आदिबद्री सरस्वती का उद्गम स्थल है। इस नदी का इतिहास महाभारत काल से भी जुड़ता है। कहते हैं कि महाभारत युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र जैसी भूमि का चयन सरस्वती नदी को ध्यान में रखकर ही किया गया था। मान्यता है कि यहीं पर भगवान ब्रह्मा ने सरस्वती नदी के किनारे ब्रह्म सरोवर की स्थापना की थी और सृष्टि की भी रचना की। महाभारत काल में हुई एक बड़ी भूगर्भीय हलचल के बाद सरस्वती का पानी सतह के नीचे चला गया जो आज तक भूगर्भ में ही बहता है। ओएनजीसी एवं इसरो की रिपोर्ट ने इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि की है।

उपरोक्त जानकारी रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में सरस्वती नदी के उद्गम एवं इसके अस्तित्व के पुरातात्विक साक्ष्यों पर चर्चा के दौरान सामने आई। हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने इस महत्वपूर्ण विषय पर हरियाणा सरस्वती विरासत बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच के साथ विस्तार से बातचीत की। डॉ. चौहान ने कहा कि हरियाणा की मनोहर सरकार सरस्वती नदी के प्रवाह पथ को फिर से स्थापित करने एवं नदी को पुनर्जीवित करने के लिए कृतसंकल्प है। वर्ष 2015 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही हरियाणा सरस्वती विरासत बोर्ड का गठन किया जाना सरकार की इस उद्देश्य के प्रति गंभीरता को दर्शाता है। यह विरासत बोर्ड राज्य भर में जहां-तहां बिखरे सरस्वती नदी के अवशेषों को ढूंढ कर उसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रयासरत है।

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ऑक्सीवनों की स्थापना व पुराने पेड़ों के लिए ‘पेंशन’ अनूठी योजनाएं : चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में पर्यावरण प्रदूषण पर चर्चा

करनाल। हरियाणा सरकार ने राज्य भर में ऑक्सीवनों की स्थापना व विकास के लिए का फैसला किया है। इस दिशा में पहल करते हुए करनाल में ऑक्सीवन शुरू भी हो चुका है और पंचकूला में भी ऑक्सीवन प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। ऐसा पर्यावरण को स्वच्छ और सांस लेने लायक बनाए रखने के उद्देश्य से किया जा रहा है। एक पेड़ जीवन भर के दौरान करीब 70 लाख का ऑक्सीजन देता है। इसलिए, पौधे जरूर लगाएं और उनका संरक्षण भी करें। जितना पेड़ लगाएंगे, उतना ही पर्यावरण को बचाएंगे। बड़े वृक्षों के संरक्षण के लिए मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने अनूठी पेंशन योजना भी शुरू करने का ऐलान किया है जिसके अंतर्गत वयोवृद्ध वृक्षों की संभाल करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं को राज्य सरकार उनकी इस सेवा के एवज़ में पेंशन देगी। रेडियो ग्रामोदय के ‘वेकअप करनाल’ कार्यक्रम में हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के करनाल स्थित क्षेत्रीय अधिकारी शैलेंद्र अरोड़ा से पर्यावरण प्रदूषण पर चर्चा के दौरान हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने की। उन्होंने कहा कि जीव-जंतु, पृथ्वी, जल वायु और मिट्टी आदि मिलकर हमारे पर्यावरण को बनाते हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों के आपसी असंतुलन को ही पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं। पर्यावरण प्रदूषण से सबका जीवन खतरे में पड़ सकता है। एक पेड़ एक बच्चे के बराबर होता है। इसलिए उनका भी संरक्षण जरूरी है।

Wake Up Karnal : Environment Day

पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कारकों की पहचान करते हुए शैलेंद्र अरोड़ा ने कहा कि जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, बायो मेडिकल वेस्ट, म्युनिसिपल सॉलि़ड वेस्ट, ई-कचरा, बैटरी का कचरा आदि मिलकर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 6 महीने के दौरान प्रदूषण को रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने करनाल में कई कदम उठाए हैं। प्रदूषित जल के शोधन के लिए मल संयंत्रों में ऑनलाइन सिस्टम और नई एसपीआर टेक्नोलॉजी लगाई गई है। उनके पैरामीटर सख्त कर दिए गए हैं जिनका पालन करना अनिवार्य है। इनका पालन न करने वालों पर जुर्माने की राशि का प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा वाटर एक्ट जिसे जल प्रदूषण नियंत्रण एक्ट 1974 भी कहा जाता है के तहत अवैध रूप से स्थापित उद्योगों के खिलाफ भी विभाग ने कड़ी कार्रवाई की है। ऐसे सात – आठ उद्योगों को बंद भी किया गया है। 1 साल के भीतर वॉटर एक्ट के तहत 9 मामले दर्ज किए गए हैं। स्पेशल एनवायरनमेंट एक्ट के तहत उद्योगों एवं बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई रूटीन की प्रक्रिया है। उन्होंने स्पष्ट किया की गंदा पानी छोड़ने वाले उद्योगों के खिलाफ वाटर एक्ट के तहत करवाई होती है। इसके अलावा बिना अनुमति के स्थापित होने वाले उद्योगों के खिलाफ भी कार्यवाही की जाती है।

डॉ. बीरेन्द्र सिंह चौहान ने पूछा कि उद्योग आम तौर पर किस-किस तरह से पर्यावरण संरक्षण के नियमों को तोड़ते हैं? उनके खिलाफ किस तरह की शिकायतें आती हैं? इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि जल शोधन संयंत्रों की नियमित चेकिंग की जाती है। इस दौरान जहां भी छेड़छाड़ पाई जाती है वहां उन्हें नोटिस देकर कार्रवाई की जाती है। इतने पर भी ना मानने पर उन उद्योगों को बंद कराने की प्रक्रिया शुरू होती है और उन पर पर्यावरण कंपनसेशन भी लगाया जाता है।

एडवोकेट राजेश शर्मा ने शिकायत की कि करनाल क्षेत्र में कई उद्योगों ने बिना अनुमति के सबमर्सिबल पंप लगा रखे हैं। इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि कुछ उद्योग प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और कुछ उद्योग नगर निगम के दायरे में। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दायरे में आने वाले उद्योगों से ऑनलाइन आवेदन मांगे जाते हैं। उनकी निगरानी के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी होती है। जो उद्योग नियमों का पालन नहीं करते, उन पर कार्रवाई होती है।

इस अवसर पर डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने केंद्र सरकार की नई पहल के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर घोषणा की है की वर्ष 2025 तक देश की हर स्थान पर पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की व्यवस्था की जाएगी। केंद्र सरकार का ग्रीन एनर्जी पर जोर है। सौर ऊर्जा के मामले में भारत विश्व नेता बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने पूछा कि करनाल शहर की हवा राज्य के अन्य शहरों के मुकाबले पर्यावरण की दृष्टि से कितनी प्रदूषित है? इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि 2 दिन का डाटा एयर क्वालिटी इंडेक्स (ए क्यू आई) के मानकों के अनुसार 54 और 73 के आसपास था। उन्होंने बताया कि करनाल का ए क्यू आई कुरुक्षेत्र के मुकाबले बेहतर है।

हरियाणा के ग्रामीण अंचल में पर्यावरण से जुड़े मसले और बड़ी चुनौतियां क्या हैं? डॉ चौहान के इस सवाल पर अरोड़ा ने कहा कि गांव में सीवरेज सिस्टम का ना होना एक बड़ी चुनौती है। स्मार्ट सिटी के लिहाज से पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए शहर में काम शुरू हुआ है। इसके तहत ट्री-प्लांटेशन और रोड क्लीनिंग की जा रही है।

कई जगह लग रहे सॉलिड वेस्ट प्लांट

शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया की कचरा निस्तारण के लिए करनाल में एक सॉलिड वेस्ट प्लांट पहले से कार्यरत है। इसके अलावा सोनीपत में भी एक प्लांट का निर्माण हो रहा है। असंध क्षेत्र में भी एक बहुत बड़ा प्लांट लगने वाला है। पंचायती राज विभाग ने 35 छोटे-छोटे प्रोजेक्ट का प्रस्ताव सरकार को भेज रखा है। अन्य जगहों पर डंपिंग ग्राउंड मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि करनाल जिले के जल स्रोतों में यमुनानगर का औद्योगिक कचरा मिलने के संबंध में यमुनानगर के संबंधित अधिकारियों से औपचारिक शिकायत कर इसे रोकने के लिए कदम उठाने के लिए कहा गया है। इस सिलसिले में 6 महीने पहले भी दोनों जिलों के अधिकारियों के बीच पत्राचार हुआ था। शैलेंद्र अरोड़ा ने गीले और सूखे कचरे को घर में ही अलग-अलग करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इससे कूड़ा निस्तारण की प्रक्रिया आसान हो जाती है।

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बाल श्रम अपराध, जहां भी देखें 1098 पर तुरंत दर्ज कराएं शिकायत : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय  हो’ में श्रम कानून एवं बच्चों के शोषण पर चर्चा

करनाल। बाल श्रम अभिशाप है। यह सामाजिक अपराध भी है। बाल श्रम होता देख कर भी चुप रहना इस कृत्य में बराबर का भागीदार होने जैसा है। इसलिए संवेदनशील बनें और इसके खिलाफ आवाज उठाएं। आप चाहें तो गुमनाम रहकर भी 1098 पर ऐसे मामलों की सूचना दे सकते हैं। बच्चों का उत्पीड़न करना अपराधी को पैदा करने जैसा है क्योंकि बड़ा होने पर ऐसे बच्चों के अपराध की ओर उन्मुख होने की संभावना ज्यादा होती है। इसलिए, सजग नागरिक का कर्तव्य निभाएं।

रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में बाल श्रम कानून एवं बच्चों के शोषण पर विषय पर हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान और हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त श्रमायुक्त अनुपम मलिक के बीच चर्चा के दौरान उभर कर सामने आए। दोनों इस बात पर एकमत थे कि यदि कोई हमारा परिचित या मित्र भी बाल शोषण में शामिल हो, तो उसे टोकना हमारा धर्म है।

जय हो में आज चर्चा बाल श्रम पर

डॉ. चौहान ने कहा कि यह दुर्भाग्य की बात है कि तमाम सख्ती और कानून के बावजूद बाल श्रम एवं शोषण का देश में अब तक उन्मूलन नहीं हो सका है। अनुपम मलिक ने उनकी बात से सहमति जताते हुए कहा कि यद्यपि बाल श्रम एवं शोषण के मामले पहले के मुकाबले काफी कम हुए हैं, फिर भी पूरी तरह यह आज भी खत्म नहीं हो सका है।

अनुपम मलिक ने बताया कि बाल श्रम के खिलाफ वर्ष 2006-2007 में श्रम विभाग की ओर से एक मुहिम चलाई गई थी जिसके तहत ऐसे मामलों के सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया था। श्रम निरीक्षकों को कैमरे भी दिए गए थे। ताबड़तोड़ छापों का सिलसिला शुरू किया गया था। इससे बाल शोषण में काफी कमी आई। चंडीगढ़ और दिल्ली के बीच हाईवे पर स्थित सैकड़ों ढाबों में बाल श्रम एवं उत्पीड़न के अनगिनत मामले थे, लेकिन विभाग की सख्ती के बाद बाल शोषण के मामले अब वहां नगण्य के बराबर हैं। ढाबों, दुकानों एवं फैक्ट्रियों से छुड़ाए गए बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए हरियाणा के फरीदाबाद, यमुनानगर और पानीपत में बाल पुनर्वास केंद्र बनाए गए थे।

नुपम मलिक के अनुसार यमुनानगर, पानीपत और फरीदाबाद के मामलों में अलग-अलग सोच देखी गई। फरीदाबाद में जहां मां-बाप ही अपने बच्चों को मारपीट कर कारखानों में काम करने के लिए भेजते थे, वहीं यमुनानगर में लोग यूपी से आकर अपने बच्चों को फैक्ट्री मालिकों के पास गिरवी रख जाया करते थे। विभाग ने ऐसे मां-बाप के खिलाफ भी सख्ती की और उन्हें पकड़ना शुरू किया। इसके बाद ऐसे मामलों पर तेजी से अंकुश लगा और बाल श्रम लगभग समाप्ति के कगार पर पहुंचा। लेकिन पानीपत का मामला अलग ही है।

डॉ. चौहान ने पूछा कि भारतीय कानून में बाल श्रम की परिभाषा क्या है और इसके दायरे में कितने साल तक के बच्चे आते हैं? बाल श्रम के खिलाफ दंड के क्या प्रावधान हैं? पूर्व श्रम आयुक्त अनुपम मलिक ने बताया कि अब 16 वर्ष तक के बच्चों को बाल श्रम कानून के दायरे में रखा गया है। पहले यह सीमा 14 वर्ष तक थी। 16 से 18 वर्ष के बच्चे किशोर वय से ऊपर के माने जाते हैं और उन्हें काम का प्रशिक्षण लेने की अनुमति दी गई है।18 वर्ष से ऊपर के बच्चों को वयस्क माना गया है।

उन्होंने बताया कि बाल श्रम पर अंकुश लगाने में सुप्रीम कोर्ट का बहुत बड़ा योगदान है। यदि कोई नियोक्ता 16 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग बच्चों से काम करवाता पकड़ा जाता है, तो बाल श्रम कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई के अतिरिक्त अतिरिक्त उसे ₹50000 का जुर्माना भी भुगतना होगाजो उस बच्चे के कल्याण के लिए बाल कल्याण कोष में जमा कराया जाएगा। इस कोष में सरकार भी अपनी तरफ से पैसे जमा करती है। बाल श्रम के मामलों की सूचना देने के लिए एक हेल्पलाइन नंबर 1098 भी जारी किया जा चुका है, जिस पर अपनी पहचान उजागर न करते हुए भी सूचना दी जा सकती है। इस नंबर से शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल कल्याण विभाग, पुलिस विभाग और श्रम विभाग जुड़े हुए हैं।

बाल श्रम और बढ़ा रहा गरीबी

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि अक्सर कहा जाता है ग़रीबी के कारण बाल श्रम होता है मगर विशेषज्ञ इसके विपरीत राय रखते हैं। अनुपम मलिक ने जोर देकर कहा कि बाल श्रम का कारण गरीबी नहीं, बल्कि यह एक धंधा बन गया है। बाल श्रम गरीबी के कारण नहीं, बल्कि कम खर्च में ज्यादा मुनाफा कमाने के उद्देश्य से कराया जा रहा है। बाल श्रम से गरीबी और बढ़ रही है क्योंकि एक बाल श्रमिक एक वयस्क की नौकरी छीनता है। बाल श्रम के खिलाफ अन्य देशों के मुकाबले भारत का कानूनी ढांचा कितना मजबूत है? डॉ. चौहान के इस सवाल पर मलिक ने कहा कि भारतीय कानून का स्तर किसी से कम नहीं है। पहले के मुकाबले अब कानून काफी सख्त हो गया है। किसी आरोपी के पकड़े जाने पर अब उसका कानून के फंदे से छूटना बहुत मुश्किल है। श्रम कानून का सूत्र वाक्य है -निर्दोष साबित होने से पहले तक आप दोषी हैं।

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इतिहास के पुनर्लेखन और शोधन पर हो तेज गति से काम :डॉ. चौहान

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तरावड़ी में प्रस्तावित शोध केंद्र दे सकता है इस कार्य को दिशा
सम्राट पृथ्वीराज चौहान जयंती पर विचार गोष्ठी

करनाल । भारतीय इतिहास के अनेक पक्ष शोधन और पुनर्लेखन की प्रतीक्षा में है। भारत के वामपंथियों और अनेक स्वार्थी विदेशी तत्वों ने हमारे इतिहास के साथ जमकर छेड़-छाड़ की। आज भी हमारी गौरवशाली दास्तानों के अनेक पन्ने और आयाम ऐसे हैं, जो आज तथ्यों और कल्पनाओं की भूलभुलैया में उलझे हुए महसूस किए जा सकते हैं। सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जयंती इस अधूरे पड़े कार्य को पूरा करने का संकल्प लेने का पावन अवसर है। हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने सम्राट पृथ्वीराज चौहान की जयंती के उपलक्ष्य में अकादमी द्वारा आयोजित विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए यह टिप्पणी की।

उन्होंने कहा कि अकादमी अध्यक्ष और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने करनाल के तरावड़ी में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की स्मृति में एक भव्य स्मारक एवं शोध केंद्र के निर्माण की घोषणा की हुई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सिरे चढ़ने से ना केवल तरावड़ी के एतिहासिक तत्वों का संरक्षण होगा बल्कि समूचे हरियाणा की शौर्य परंपरा पर व्यवस्थित शोध और लेखन का कार्य प्रारंभ हो सकेगा।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सेवानिवृत्त निदेशक डॉक्टर धर्मवीर शर्मा और क्षत्रीय इतिहास पर कार्य करने वाले बलबीर सिंह चौहान इस विचार गोष्ठी में बतौर वक्ता शामिल रहे। हरियाणा साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक डॉ. पूर्ण मल गोड सहित अनेक विद्वानों की उपस्थिति में ऑनलाइन विचार गोष्ठी में तरावड़ी स्थित सम्राट पृथ्वीराज चौहान के क़िले के अवशेषों को संरक्षित करने के लिए नए सिरे से संगठित प्रयास करने का प्रस्ताव पारित किया गया।

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा जो देश, समाज या संस्कृति अपने इतिहास को भूल जाता है और अपनी विरासत को संभाल कर नहीं रख पाता, ऐसे देश और संस्कृति का लुप्त हो जाना तय है। दुनिया ने ऐसे कई देशों और संस्कृतियों को मिटते देखा है जिन्होंने अपनी सभ्यता की विरासत को अगली पीढ़ी के लिए संजो कर नहीं रखा। विश्व मानचित्र पर ऐसे देशों का अब नामोनिशान भी बाकी नहीं है। श्रेष्ठ और उन्नत संस्कृति को जीवित दिखना भी चाहिए। इसके लिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना अत्यंत आवश्यक है। सनातनी संस्कृति के महान पराक्रमी शासक चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने हरियाणा के तरावड़ी इलाके में कई लड़ाइयां लड़ी। उनके व्यक्तित्व एवं जीवन वृत्त की चर्चा आज और ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है।

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कोरोना से संग्राम में अग्रिम मोर्चे की योद्धा है आशा वर्कर: डॉ. चौहान

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संकट काल में हर घर तक छह बार पहुँच का दावा

करनाल। गांव में कोरोना संक्रमितों का डोर टू डोर सर्वेक्षण करना हो या होम आइसोलेशन में भेजे गए कोरोना मरीजों को दवाओं की किट पहुंचाने का काम, गर्भवती महिलाओं की जांच करानी हो या प्रसव के लिए उन्हें अस्पताल ले जाने का काम, नवजात बच्चों का टीकाकरण हो या डेंगू-मलेरिया से बचने के लिए गांव में स्प्रे कराने का काम, अपनी जान जोखिम में डालकर भी स्वास्थ्य के हर मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहने वाली मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकत्रियों को सेल्यूट तो बनता ही है।

कोरोना से संग्राम में अग्रिम मोर्चे की योद्धा है आशा वर्कर

सरकार द्वारा आमजन के लिए प्रदत्त स्वास्थ्य सुविधाओं को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण कड़ी का काम करने वाली इन आशा वर्करों को अपने काम के बदले कोई वेतन नहीं मिलता। जनसामान्य के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली इन मान्यता प्राप्त महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अद्भुत है।
हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में आशा वर्करों के कार्यों पर चर्चा के दौरान यह टिप्पणी की। उनके साथ चर्चा में शामिल थे करनाल के जिला आशा कोऑर्डिनेटर संजीव एवं आशा वर्कर कविता। डॉ. चौहान ने बताया कि प्रति एक हजार की आबादी वाले क्षेत्र के लिए एक आशा वर्कर की नियुक्ति की जाती है। इस समय करनाल जिले में 1142 आशा वर्कर कार्यरत हैं क़रीब 40 आशा वर्करों की रिक्तियां मौजूद हैं। कोरोना काल में सरकार की स्वास्थ्य सुविधाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाना आशा वर्करों की बदौलत ही संभव हो पाया है।
संजीव कुमार ने स्पष्ट किया कि कोरोना के दौरान 6 बार किए गए डोर टू डोर सर्वेक्षण में संक्रमण की स्थिति का पता लगाया गया और लक्षण वाले लोगों को जांच के लिए विभिन्न अस्पतालों में भेजा गया। आशा वर्करों ने होम आइसोलेशन में भेजे गए मरीजों को सरकारी दवाओं की किट पहुंचाने का काम भी किया। संजीव ने बताया कि सर्वेक्षण के लिए सरकार की ओर से एक मोबाइल ऐप तैयार किया गया है जिसे हर आशा वर्कर को दिया गया है। इस ऐप के जरिए संक्रमित मरीजों का डाटा दर्ज किया जाता है। कविता ने बताया कि कोरोना सर्वे के दौरान आशा वर्करों को सरकार की तरफ़ से मोबाइल फ़ोन,थर्मल स्कैनर व थर्मामीटर आदि दिए गए ।

गर्भावस्था और शिशु के जन्म के बाद करती है जच्चा-बच्चा की संभाल

जिला कोऑर्डिनेटर संजीव ने बताया कि अपने निर्धारित क्षेत्र में हर निवासी तक पहुंचना आशा कार्यकर्ताओं का दायित्व है। घर हो या डेरा, आशा वर्कर हर जगह जाकर लोगों के स्वास्थ्य का जायजा लेती हैं। उन्हें अपने क्षेत्र में हुए हर जन्म एवं मृत्यु का भी पंजीकरण करना पड़ता है।संजीव ने बताया कि कोरोना महामारी फैलने से पहले आशा वर्कर गांव की महिलाओं के स्वास्थ्य की देखभाल करती थीं। गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण करवाना, प्रसव पूर्व रक्तचाप, मधुमेह एवं एचआईवी आदि की जांच करवाना और मलेरिया एवं डेंगू से बचाव के लिए समय-समय पर गांव में दवा का छिड़काव कराना आशा वर्कर के दायित्वों में शामिल है। संजीव ने बताया कि गांव में गर्भवती महिलाओं की सूची बनाने, प्रसव से पूर्व तीन-चार बार चेकअप कराने, उनका अल्ट्रासाउंड कराने, प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं को अस्पताल लेकर जाने और डिलीवरी के बाद जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य का जायजा लेने के लिए आशा वर्करों को कम से कम 6 बार उनके घर जाना पड़ता है।इसके अलावा जच्चा से भी प्रसव बाद पेश आने वाली परेशानियों के बारे में पूछा जाता है। कोई परेशानी होने पर आशा वर्कर एंबुलेंस बुलाकर ऐसी महिलाओं को अस्पताल ले जाती हैं। कविता ने बताया कि बच्चे के जन्म के बाद से लेकर 5 वर्ष की उम्र होने तक आशा वर्करों को बच्चे की देखभाल करनी पड़ती है। उन्हें बच्चे के हर टीकाकरण के शेड्यूल का ध्यान रखना पड़ता है और बच्चे की मां को इसके लिए प्रेरित करना पड़ता है। जन्म के 1 महीने के बाद बीसीजी के टीके से लेकर 10 साल का होने तक बच्चों को टीके लगते रहते हैं। टीका लगने के बाद यदि बच्चे को बुखार आ जाए तो उसके स्वस्थ होने तक आशा वर्कर उसके स्वास्थ्य पर निगाह रखती हैं।

ऐसे नियुक्त होती है आशा वर्कर

आशा वर्करों की नियुक्ति प्रक्रिया क्या है और उनका मानदेय किस प्रकार तय किया जाता है? कुटेल निवासी एक प्रतिभागी के सवाल पर संजीव ने बताया कि गांव में एक वीएलसी कमेटी होती है जो आशा वर्करों का चयन करती है। किसी गांव में आशा वर्कर की जगह खाली हो तो सर्वप्रथम सरपंच की ओर से एक-दो दिन पहले इसकी मुनादी करा कर इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे जाते हैं। सरपंच ही इस तथ्य को अभिप्रमाणित करता है कि अभ्यर्थी उसके गांव की स्थाई निवासी है। आवेदन पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों को वीएलसी के पास भेजा जाता है। इस कमेटी में एएनएम के अलावा ब्लॉक आशा कोऑर्डिनेटर और प्रभारी मेडिकल अफसर (एमओ) शामिल होते हैं। एमओ तीन या चार लोगों की कमेटी गठित करता है जो अभ्यर्थी के दस्तावेजों के आधार पर उनकी अर्हता के अंक निर्धारित करती है।

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धर्मांतरण की प्रवृत्ति खतरनाक, समाज को करें जागरूक : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में गांव उपलाना पर चर्चा

करनाल। धर्मांतरण की प्रवृत्ति अत्यंत खतरनाक है। यह सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने का काम करता है जो देश में अशांति का मुख्य कारण है। देश के हर नागरिक को अपनी स्वेच्छा से किसी भी धर्म का पालन करने या उसे स्वीकार करने की आजादी है, लेकिन धोखे, पैसे के लालच या डर दिखाकर किसी का भी धर्मांतरण कराना कानूनन अपराध है।

धर्मांतरण के खिलाफ देश में पहले से कानून बने हुए हैं। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं कमोबेश देश के हर हिस्से में देखने-सुनने को मिलती हैं। इसलिए धर्मांतरण रोकने के लिए सिर्फ कानून काफी नहीं है। इसके खिलाफ लोगों को जागरूक करना होगा और धैर्य के साथ कोई योजना बनानी होगी।

वार्ता का ऑडियो …..
म्हारे गाम की बात में आज बात उपलाना की
यूट्यूब पर देखें पूरा कार्यक्रम…….

ये विचार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में ग्रामीणों से चर्चा के दौरान व्यक्त किए। यह टिप्पणी उन्होंने उपलाना की वस्तुस्थिति पर चर्चा के दौरान की। कार्यक्रम में गांव उपलाना पर चर्चा के दौरान ग्रामीण सुनील दत्त ने बताया कि ईसाई ऐ मिशनरियों की गतिविधियां उप लाना सहित क्षेत्र में कई गांवों में बढ़ रही हैं। इसके चलते भविष्य में भी सामाजिक व क़ानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती है।

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