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रेडियो ग्रामोदय व यूनिसेफ द्वारा वैक्सीनेशन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

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अफवाहों से बचें, संदेह दूर करें और वैक्सीनेशन लगवाएं : डॉ चौहान

निसिंग। दो गज दूरी, मास्क और सैनिटाइजेशन के साथ कोविड रोधी वैक्सीन लगवा कर स्वयं को कोविड के विरुद्ध चल रहे इस महासमर में ज्यादा मजबूत बनाएं। विश्व स्तर पर हुए अध्ययन स्पष्ट रूप से बता रहे हैं कि वैक्सीन लगवाना कोविड की रोकथाम में अत्यंत कारगर सिद्ध हुआ है । कोरोना के विस्तार को रोकने में सैनिटाइजेशन , मास्क, दो गज दूरी और वैक्सीनेशन अत्यंत कारगर सिद्ध हुए हैं । रेडियो ग्रामोदय और यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में ग्रामोदय भवन, गोंदर में आयोजित कोविड रोधी जागरूकता कार्यक्रम के दौरान ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष और प्रदेश भाजपा प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने यह टिप्पणी की।

कार्यक्रम में कोविड प्रोटोकॉल के अनुरूप मास्क और दूरी का अनुपालन करते हुए उपस्थित ग्रामीणों व गणमान्य व्यक्तियों को रेडियो ग्रामोदय की ओर से वैक्सीनेशन तथा कोविड रोधी विभिन्न उपायों के प्रति जानकारी प्रदान की गई। रेडियो ग्रामोदय के अधिकारियों ने ग्रामीणों द्वारा पूछे गए विभिन्न प्रश्नों का सरकार व यूनिसेफ द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप उत्तर दिया और सभी का आह्वान किया कि बिना किसी संदेह के वैक्सीन अवश्य लगवाएं। वैक्सीनेशन को लेकर मन में कोई संदेह ना पालें तथा एक जागरूक नागरिक की तरह कोविड रोधी प्रोटोकॉल का अनुपालन करें।

रेडियो ग्रामोदय के संयोजक शिवम राणा के ‘जागरूक हम, तो कोरोना खत्म’ के उद्घोष से कार्यक्रम संपन्न हुआ। इस अवसर पर हिसम सिंह, पोखर त्यागी, विशाल त्यागी, नानक, अशोक, राजकुमार, आयुष, अमन, दीपक, दीपेंद्र, संगम व अन्य ग्रामवासी मौजूद रहे।

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ब्लैक फंगस लाइलाज नहीं, सावधानियां बरतें तो हो सकता है इससे बचाव : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में ब्लैक फंगस के लक्षणों एवं इससे बचाव पर चर्चा

करनाल। ब्लैक फंगस एक खतरनाक बीमारी जरूर है, लेकिन लाइलाज नहीं। कोरोना की तरह यह वायरस चीन से आयातित नहीं है और न ही यह छुआछूत से फैलने वाला संक्रमण है। ब्लैक फंगस एक विशेष प्रकार के फफूंदी से फैलने वाली बीमारी है जिसके जीवाणु वायुमंडल में हर जगह पाए जाते हैं। मजबूत इम्यूनिटी वाले लोगों को इसके जीवाणु नुकसान नहीं पहुंचा पाते, लेकिन कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग आसानी से इसके शिकार बन जाते हैं। अगर संक्रमण के शुरुआती चरण में ही इसकी पहचान हो जाए तो ब्लैक फंगस का शत-प्रतिशत इलाज संभव है।

उपरोक्त जानकारी रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में ब्लैक फंगस के लक्षण एवं इससे बचाव के विषय पर चर्चा के दौरान उभरकर सामने आई। बीमारी के प्रति अपने जागरूकता अभियान के तहत हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान करनाल स्थित कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज स्थित ईएनटी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. विकास ढिल्लों के साथ बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार ने ब्लैक फंगस को भी अधिसूचित बीमारी घोषित कर दिया है। फलों और सब्जियों पर भी मौजूद रहने वाले इसके जीवाणु नाक और मुंह के रास्ते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ब्लैक फंगस से करनाल में एक मरीज की मौत होने का भी समाचार है।

ऐसा क्यों है कि कोरोना से ठीक हुए लोगों और मधुमेह रोगियों में ही ब्लैक फंगस के सर्वाधिक मामले पाए जा रहे हैं? डॉ. चौहान के इस सवाल पर डॉ. विकास ढिल्लों ने कहा कि कोरोना हमारी इम्यूनिटी को कमजोर कर देता है। कोरोना के उपचार के दौरान मरीजों को स्टेरॉइड की दवा भी दी जाती है जो हमारे खून मैं मौजूद वाइट ब्लड कॉरपसल्स की प्रतिरोधक क्षमता को घटा देता है। स्टेरॉइड चाहे एनाबॉलिक हो या कोई और, हमारी इम्यूनिटी को कम करता ही है। ब्लैक फंगस कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को ही प्रभावित करता है। कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों में अनियंत्रित मधुमेह के रोगी, एचआईवी मरीज, एंटी कैंसर दवाई लेने वाले लोगों व कोरोना से ठीक हो चुके लोगों के अलावा किडनी, लीवर या किसी अन्य अंग का प्रत्यारोपण करवाने वाले लोग शामिल हैं।

डॉ. विकास ढिल्लों ने बताया कि ब्लैक फंगस मिट्टी और वायुमंडल में मौजूद होता है जो काले रंग का होता है। जीभ पर काले रंग की या तालु के ऊपर सफेद रंग की परत का चढ़ जाना ब्लैक फंगस के लक्षण हैं। कवक काले और उजले दोनों रंग के होते हैं। कल्पना चावला अस्पताल में ब्लैक फंगस के अब तक 10-12 मामले सामने आ चुके हैं।

डॉ. चौहान ने पूछा कि इस बीमारी के लक्षणों को कैसे पहचाने और किस स्टेज में जाने के बाद मरीज का बचना मुश्किल हो जाता है? इस सवाल पर डॉ. विकास ने बताया कि कोरोना से ठीक होने के बाद फिर से बुखार आना शुरू हो जाए, चेहरे के एक भाग में दर्द होना शुरू हो या नाक बंद हो जाए, नाक से रक्त मिश्रित तरल पदार्थ निकलने लगे या चेहरे पर एक तरफ संवेदना महसूस होना बंद हो जाए, दांत हिलने लगे, टूटते समय काला सा पदार्थ निकले या जीभ पर काली जैसी परत जम जाए, आंखों से धुंधला या दो – दो आकृतियां दिखने लगे और चेहरे की त्वचा भी काली पड़ने लगे तो इसे ब्लैक फंगस का लक्षण समझना चाहिए। ब्लैक फंगस के रोगी अक्सर तब उपचार के लिए आते हैं जब वह सेप्टीसीमिया में जा चुका होता है। यदि शुरुआत में ही डॉक्टर से संपर्क किया जाए तो शत-प्रतिशत इलाज संभव है।

ब्लैक फंगस के रोगियों का किस अवस्था में जाने के बाद बचना मुश्किल होता है? डॉ. चौहान के इस सवाल पर डॉ. विकास ने बताया कि मरीज की जब आंख खराब हो जाती है और फंगस मस्तिष्क में चला जाता है तो मामला नियंत्रण से बाहर चला जाता है। इसे ही सेप्टीसीमिया कहते हैं। यह बीमारी का अंतिम चरण होता है। ब्लैक फंगस के रोगियों का अस्पताल में डॉक्टरों की देखरेख में ही उपचार संभव है क्योंकि दवाएं नसों के माध्यम से दी जाती हैं एवं शरीर के अन्य हिस्सों पर भी कड़ी निगरानी रखनी पड़ती है।

पांच मिनट तक नाक दबाकर मुंह से सांस लें

डॉक्टर विकास ने बताया कि नाक से खून बहने या नकसीर के रोगियों को सीधा बैठकर नाक को 5 मिनट तक उंगलियों से दबाकर रखना चाहिए और मुंह से सांस लेना चाहिए। ऐसा करने से नाक से रक्त का प्रवाह रुक जाएगा और आराम मिलेगा। यह क्रिया लेट कर कदापि नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अक्सर कान खुजाने की आदत भी अच्छी नहीं है। इससे कान का पर्दा फटने या परदे में छेद होने का खतरा बढ़ जाता है।

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कोरोना से जंग में सकारात्मक ऊर्जा जरूरी, संकट का यह अस्थायी दौर : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में कोविड अस्पतालों के आंतरिक हालात पर चर्चा

करनाल। कोरोना से जंग में मनोदशा की भूमिका दवाओं से कम नहीं। अपनी सकारात्मक सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण कोरोना के कई गंभीर मरीज स्वस्थ होकर घर लौट आए और कई अपेक्षाकृत कम गंभीर मरीज भी हौसला छोड़ देने के कारण जिंदगी की जंग हार बैठे। संकट का यह अस्थायी दौर है, शीघ्र टल जाएगा। इसलिए सकारात्मक रहें और नुकसान को न्यूनतम करने का प्रयास करें।

उपरोक्त विचार बिंदु रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान और कोरोना से जंग जीतकर घर लौटे रोहतक निवासी शमशेर दहिया के बीच हुई चर्चा के दौरान उभरकर सामने आए। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार एवं टीवी एंकर रोहित सरदाना की कोरोना से हुई मौत पर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए डॉ. चौहान ने कहा कि कोरोना से दिनोंदिन विकराल हो रही स्थिति के मद्देनजर यह जरूरी है कि हर व्यक्ति इसके वैक्सीन का टीका अवश्य ले। इससे कम से कम इतना भरोसा तो किया ही जा सकता है कि वैक्सीनेशन के बाद यदि संक्रमण होता भी है तो यह जानलेवा नहीं होगा।

चर्चा के दौरान अस्पतालों में उपचार के हालात, वहां व्याप्त कमियों और मेडिकल स्टाफ पर पड़ रहे काम के अत्यधिक बोझ की भी चर्चा हुई। कोरोना से जंग जीतकर लौटे रोहतक के शमशेर दहिया ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि अपने उपचार के दौरान उन्होंने अस्पताल में कुछ व्यवस्थागत कमियों को महसूस किया जिन्हें मात्र थोड़े से प्रयास से दूर किया जा सकता है। रोहतक पीजीआई का जिक्र करते हुए दहिया ने कहा कि वहां डॉक्टरों ने उनका पूरा ध्यान रखा और उनकी मदद की। 1 अप्रैल को कोरोना पॉजिटिव होने की रिपोर्ट आने के बाद उन्हें अगले 12 दिन अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इस दौरान काफी कमजोरी महसूस हुई और सांस उखड़ने लगी थी। ऑक्सीजन का स्तर 76 तक चला गया था। अचेत हो जाने पर उन्हें आईसीयू में ले जाया गया।

डॉ. चौहान ने जब पीजीआई रोहतक समेत तमाम अस्पतालों में व्यवस्था सुधार के लिए अपने अनुभव के आधार पर शमशेर दहिया से सुझाव मांगे तो उन्होंने बताया कि कोरोना से संघर्ष के दौरान अस्पताल में उन्हें कई असुविधाओं का भी सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि मॉड्यूलर आईसीयू वार्ड में 16 मरीजों के लिए मात्र एक स्वीपर है जिसे 8 घंटे के दौरान सभी मरीजों की हर जरूरत का ध्यान रखना पड़ता है। स्वीपर कम होने के कारण डॉक्टरों पर भी काम का अतिरिक्त बोझ पड़ता है। डॉक्टर पहले से ही काम के बोझ से दबे हैं। स्टाफ कम होने के कारण एक-दो मरीजों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा जिन्हें बचाया जा सकता था। दहिया ने बताया कि स्वीपर की संख्या कम होने के कारण वार्ड का शौचालय अत्यंत गंदा रहता है और बदबू भी फैलती है। इसके अलावा आईसीयू वार्ड में मरीजों के पीने के लिए गर्म पानी का भी कोई प्रबंध नहीं है जो कि कोरोना के उपचार में अत्यंत सहायक है। इसके अलावा भोजन की पैकिंग की भी उचित व्यवस्था करने की जरूरत है ताकि यह मरीजों के खाने लायक और गर्म रह सके।

शमशेर दहिया ने बताया कि गर्म पानी के लिए उन्हें अपने घर से इलेक्ट्रिक केतली मंगवानी पड़ी। मरीजों के परिजन अस्पताल में अपने लोगों का हाल जानने के लिए अत्यंत चिंतित रहते हैं और इसे लेकर डॉक्टरों से अक्सर उनकी कहासुनी भी होती रहती है। उन्होंने सुझाव दिया कि मरीजों को अपने परिजनों से वीडियो कॉल करने की व्यवस्था करवाई जाए तो इन झगड़ों को टाला जा सकता है। दहिया ने कोरोना के मरीजों को नींद की दवा भूलकर भी न लेने की सलाह दी और अस्पताल में ऑक्सीजन के लिए ऐडऑन सिलिंडर मास्क स्टॉक में रखने की जरूरत बताई।

उनकी इस सलाह पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. चौहान ने कहा कि स्थानीय स्तर पर प्रशासन के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की चूक से ही अव्यवस्था फैलती है। केंद्र और राज्य सरकार अस्पतालों में व्यवस्था सुधार के लिए गंभीर है। उन्होंने बताया कि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए हरियाणा सरकार ने राज्य के 9 जिलों में वीकेंड लॉकडाउन की घोषणा की है। सड़क पर लोगों के अनावश्यक विचरण को प्रतिबंधित किया गया है।

शमशेर दहिया ने बताया कि कुछ घरेलू उपाय कोरोना के उपचार में फायदेमंद साबित हो सकते हैं। गर्म पानी का सेवन तो जरूरी है ही, किवी, स्ट्रॉबेरी चुकंदर और तुलसी की चाय का सेवन भी अत्यंत लाभकारी है। इनमें भरपूर विटामिन सी पाया जाता है। पंसारी के यहां मिलने वाले कपूर को कपड़े में बांधकर सूंघने से ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है। कोरोना मरीजों को हमेशा करवट या पीठ के बल ही लेटना चाहिए। यह भी ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में सहायक होता है।

वैक्सीन के कारण विजयी हुए पूर्व प्रधानमंत्री

वेकअप करनाल में चर्चा के दौरान वैक्सीनेशन की महत्ता को रेखांकित करते हुए डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने यह महत्वपूर्ण जानकारी दी कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह कोरोना से स्वस्थ होकर घर लौट आए हैं। उन्होंने बताया कि वैक्सीनेशन के दोनों डोज लेने के बावजूद डॉ. मनमोहन सिंह कोरोना से संक्रमित हो गए थे और उन्हें दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया था। वैक्सीनेशन के कारण उन्हें गंभीर प्रकार का संक्रमण नहीं हो पाया और वह उपचार के बाद शीघ्र स्वस्थ हो गए। ज्ञातव्य है कि डॉ. मनमोहन सिंह एक उम्रदराज व्यक्ति हैं, इसके बावजूद कोरोना उन्हें कुछ खास नुकसान नहीं पहुंचा पाया और वह सकुशल घर लौट आए।

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कोरोना पर गाइडलाइंस का करें पालन, दो मास्क लगाएं : डॉ. चौहान

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वैक्सीन लगने के बाद संक्रमण हो भी तो जानलेवा नहीं रहता

रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल में वैक्सीन को लेकर भ्रांत धारणाओं और कोरोना से बचाव के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा

करनाल। कोरोना की दूसरी लहर ज्यादा खतरनाक है। इसकी चपेट में लोग आते जा रहे हैं। लेकिन संतोष की बात यह है कि संक्रमण के बाद अब स्वस्थ होने वालों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।आवश्यकता इस बात की है कि कोरोना से डरे नहीं, लेकिन सावधान जरूर रहें। सरकारी गाइडलाइंस का पालन करें और वैक्सीन अवश्य लगवाएं। वैक्सीनेशन के बाद संक्रमण होने पर जान जाने का खतरा न के बराबर हो जाता है ऐसा विशेषज्ञों का दावा है।
यह विचार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में कोरोना से जूझकर स्वस्थ हुए डी. ए. वी. कॉलेज करनाल के प्राचार्य डॉ. आर. पी. सैनी और कोरोना मरीज़ों के लिए प्लाज़्मा उपलब्ध कराने में जुटी सामाजिक संस्था के संचालक शुभम गुप्ता के साथ चर्चा में व्यक्त किए।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय रोहतक के वरिष्ठ चिकित्सकों के हवाले से डॉ. चौहान ने कहा कि वर्तमान दौर में आवश्यकता पढ़ने पर घर से निकलना भी पढ़े तो दो मास्क लगाकर निकलना चाहिए। डॉ. चौहान ने कहा कि वैक्सीन लगवाना कोरोना से बचाव का सबसे कारगर तरीका है। लेकिन दुर्भाग्यवश इसको लेकर कुछ लोग भ्रम फैलाने में लगे हैं। कुछ लोग तो कोरोना महामारी को सरकार का षड्यंत्र बताने से भी नहीं चूकते। उन्होंने बताया कि भारत में अब तक जितने लोगों को कोरोना की वैक्सीन दी जा चुकी है, उसकी संख्या आबादी के लिहाज से यूरोप के कई देशों के बराबर है।

डॉ. चौहान ने कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों से आह्वान किया कि उन्हें अन्य लोगों की जान बचाने के लिए आगे आकर अपना प्लाज्मा डोनेट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति का प्लाज्मा दान दो लोगों की जिंदगी बचा सकता है। उन्होंने माना कि एनसीआर के गुड़गांव और फरीदाबाद में कुछ समय के लिए अस्पतालों में बेड का संकट उत्पन्न हो गया था, लेकिन इसे तुरंत दूर कर लिया गया।

प्राचार्य डॉ. आर. पी. सैनी ने बताया कि वह और उनकी पत्नी दोनों कोरोना से संक्रमित हो गए थे। पहले हल्का बुखार हुआ, फिर गले में खराश हुई। जांच कराने पर दोनों कोरोना पॉजिटिव निकले। शुरू में तो डर हुआ, लेकिन ईश्वर में आस्था रखते हुए हौसला बनाए रखा। घरेलू उपचार गर्म पानी व काढ़े के अलावा कुछ खास दवाओं के सेवन से चार-पांच दिनों बाद ही सुधार दिखने लगा। डॉ. सैनी ने कहा कि कोरोना पर दुष्प्रचार से बचना चाहिए। बीमारी की गंभीरता को समझें। खुद भी बचें और दूसरों की भी जान बचाएं।

सामाजिक संस्था के माध्यम से रक्तदान के कार्य में जुटे शुभम गुप्ता ने कोरोना के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कोरोना के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी अत्यंत कारगर उपाय है। शुभम ने कहा कि उनकी संस्था ने करनाल ही नहीं अपितु प्रदेश के विभिन्न हिस्सों और दिल्ली तक मरीज़ों को प्लाज़्मा उपलब्ध कराया है।

चर्चा के दौरान जींद से वेदप्रकाश ने जींद ज़िले से सम्बंधित कुछ तथ्य रखें और व्यवस्था को और दुरुस्त बनाए जाने की वकालत की। इस अवसर पर डॉ. चौहान ने जानकारी दी कि पानीपत और हिसार में पांच सौ बिस्तरों वाले दो अस्पतालों का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर करने के आदेश मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दिए है और प्रदेश सरकार इसके प्रति अत्यंत गंभीर है।

प्लाजमा डोनेशन कब करें ?

एनजीओ संचालक शुभम गुप्ता ने बताया कि ऑक्सीजन जब चिंताजनक स्तर तक नीचे गिर जाए और रक्तचाप में भी भारी उतार-चढ़ाव होने लगे तो मरीज को प्लाज्मा चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। मरीज़ को प्लाज़्मा का दान कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुका व्यक्ति ही कर सकता है। वैसा व्यक्ति जिसे कोरोना संक्रमण से ठीक हुए कम से कम 28 दिन हुए हों, अपना प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। एक बार प्लाज्मा डोनेट करने के 14 दिन के बाद ही व्यक्ति दूसरी बार प्लाज्मा डोनेट कर सकता है। डोनेशन के दौरान प्लाज्मा एक तरफ एकत्र होता है और रक्त के बाकी अवयव वापस दाता के शरीर में लौट आते हैं। 450 एमएल रक्त में 320 एमएल प्लाज्मा होता है।

शुभम गुप्ता के अनुसार उनकी संस्था दिल्ली, गाजियाबाद, मुरादाबाद, करनाल और चंडीगढ़ समेत कई शहरों में प्लाज्मा उपलब्ध करवा चुकी है। उन्होंने जरूरतमंदों की सुविधा के लिए अपना मोबाइल नंबर भी दिया। 7015130620 नंबर पर कॉल कर जरूरतमंद उनसे प्लाज्मा की मदद ले सकते हैं।

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