ग्रामोदय

Month: June 2021

कबीर आज भी प्रासंगिक : डॉ. चौहान

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जयंती पर ग्रंथ अकादमी व रेडियो ग्रामोदय की ओर से दोहा पाठ का आयोजन

करनाल / पंचकुला । संत कबीर दास के कालखंड में विभिन्न सामाजिक विडंबनाएं मौजूद थीं। संत कबीर में अपनी रचनाओं के माध्यम से समकालीन सत्ता एवं व्यवस्थाओं को चुनौती देने का सामर्थ्य था और उन्होंने ऐसा ही किया। कबीर के कार्यों, चिंतन, व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाओं में अध्यात्म की गहराई और ऊंचाई थी। उन्होंने निर्भीक होकर तत्कालीन सत्ताधीशों एवं शक्तिशाली वर्ग को चुनौती देने का काम किया। एक साहित्यकार से अपेक्षा भी यही होती है कि वह अपनी रचनाओं से सामाजिक विडंबनाओं एवं विकृतियों पर प्रहार करे। कवियों – साहित्यकारों पर अपने समाज को दिशा देने का भी दायित्व है। हर कवि के अंदर कबीर होने के तत्व मौजूद होते हैं। समाज को सचेत करने के लिए उस सामर्थ्य को जगाना होगा।

उपरोक्त विचार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ वीरेंद्र सिंह चौहान ने संत कबीर दास की जयंती पर आयोजित दोहा पाठ के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने इस आयोजन के सभी प्रतिभागियों को हरियाणा ग्रंथ अकादमी की ओर से आभार प्रकट करते हुए उनसे अपने-अपने दौर का कबीर बनने का आह्वान किया और कहा कि कबीर बनने पर कोई रोक नहीं है।

ग्रंथ अकादमी और रेडियो ग्रामोदय के संयुक्त तत्वावधान मैं आयोजित इस दोहा पाठ का संचालन कवियित्री नीलम त्रिखा ने किया। उन्होंने कार्यक्रम की कमान संभालते हुए अपने उद्बोधन में कहा कि कबीर दास एक बहुत बड़े समाज सुधारक और ईश्वर भक्त थे। उनके अंदर स्वाभिमान कूट- कूट कर भरा था। अपनी रचनाओं से उन्होंने मनुष्यों को सारे भेद मिटाकर मानव मात्र के लिए एकजुट हो जाने का संदेश दिया है। इस अवसर पर उन्होंने एक प्रेरक पंक्ति का भी उल्लेख किया — मात-पिता के हाथ ज्यूं, ज्यू बरगद की छांव
क्यों जन्नत को खोजता, जन्नत उनके पांव।

कार्यक्रम का शुभारम्भ श्री मद्भागवत गीता वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के सातवीं कक्षा के छात्र यजुर कौशल के द्वारा संत कबीर के दोहों के सुमधुर सस्वर पाठ के साथ हुआ ।

दोहा पाठ की शुरुआत डॉ. अश्विनी शांडिल्य ने अपनी स्वरचित रचनाओं से की। उन्होंने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा, —

अथाह समुद्र है ज्ञान का, माणिक छिपे अनेक
क्या है तेरे काम का, गुरु बतलाए एक।
गुरु प्रकाश स्तंभ है, पथ को करें प्रशस्त
ज्योति ज्ञान की जल उठे, अंधकार हो पस्त।

उनके बाद चंडीगढ़ से जुड़ी संगीता शर्मा ने अपने भावों को कुछ यूं व्यक्त किया, –

श्याम बजाए बांसुरी, मन का यह चितचोर
प्रेम लगन की धुन बजी, नाचे मन का मोर।

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वैकल्पिक फसलों की हो खेती : डॉ. चौहान

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वेक अप करनाल में ग्राउंड वाटर संरक्षण पर चर्चा

करनाल। पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व को बचाने के लिए भू-जल का संरक्षण बहुत जरूरी है। जमीन के नीचे स्थित इस जलसंपदा को बचाने के लिए हमें इसका दोहन सीमित करना होगा। भूजल का दोहन कम करने के अनेक उपायों में कृषि और बागवानी भी एक है। हमें अपनी खेती करने के अंदाज को बदलना होगा। धान की फसल उपजाने में ग्राउंड वाटर की बड़ी मात्रा का दोहन होता है। एक अनुमान के अनुसार 1 किलो धान के उत्पादन में 4000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसके कारण करनाल जिले के गांवों में भूजल का स्तर घटकर अब 100 से 120 फीट नीचे चला गया है। पहले या स्तर जमीन से सिर्फ 30 फीट नीचे हुआ करता था। यह घटता भूजल स्तर चिंता का विषय है। इसलिए किसानों को अब ध्यान से अन्य फसलों की ओर जाना होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर हरियाणा सरकार ने 3 साल पहले मेरा पानी मेरी विरासत योजना शुरू की थी जिसके तहत कई प्रावधान किए गए हैं।

उपरोक्त टिप्पणी हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम वेकअप करनाल में असंध के कृषि विकास अधिकारी डॉ. राधेश्याम से चर्चा के दौरान की। मेरा पानी मेरी विरासत योजना को धरातल पर उतारने में पेश आ रही समस्याओं पर चर्चा करते हुए डॉ. राधेश्याम ने बताया कि पहले इस योजना को जलशक्ति अभियान के नाम से किसानों के बीच प्रचारित किया गया था। ब्लॉक एवं जिला स्तर पर किसान कैंप लगाकर किसानों को जागरूक किया गया कि एक किलो धान का उत्पादन करने में औसतन 4000 लीटर पानी खर्च होता है जबकि इसकी वैकल्पिक फसल मक्की के उत्पादन में मात्र 800 लीटर पानी की खपत होती है। इसलिए किसानों को वैकल्पिक फसलों की बिजाई पर ध्यान देना चाहिए। डॉ राधेश्याम ने बताया की वैकल्पिक फसलों में मक्की, बाजरा, कपास, मूंग, उड़द, तिल आदि शामिल हैं।

वेक अप करनाल

डॉ. चौहान ने बताया कि किसानों को जागरूक करने के सुपरिणाम सामने आए। इस योजना के तहत हरियाणा में करीब एक लाख एकड़ भूमि धान मुक्त हो गई। धान न बोने वाले किसानों के खाते में प्रदेश सरकार ने 52 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि डाली। अब सरकार का लक्ष्य दो लाख एकड़ भूमि को धान उत्पादन से मुक्त करने का है। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ राधेश्याम ने बताया कि पहले मक्की के खरीदारों का अभाव था। इसे दूर करने के लिए सरकार ने वैकल्पिक फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया और फसलों के खरीदार भी तैयार किए। इसका नतीजा यह हुआ कि हरियाणा के 15 जिलों में करीब 15 सौ एकड़ भूमि में किसानों ने मक्की की फसल उपजाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि मेरा पानी मेरी विरासत योजना के तहत सरकारी पोर्टल पर अपनी फसलों का पंजीकरण कराने वाले किसानों की ही फसल सरकार द्वारा खरीदी गई।

डॉ. राधेश्याम ने बताया कि धान के वैकल्पिक फसलों के उत्पादन के लिए विभाग को पूरे करनाल जिले के लिए 8700 एकड़ भूमि का लक्ष्य दिया गया है। फसलों का पंजीकरण कराने में उपलाना का स्थान सबसे ऊपर है। पंजीकरण की अंतिम तिथि 25 जून है। उन्होंने बताया की सरकार ने वैकल्पिक फसलों में चारे के उत्पादन को भी शामिल किया है। चारा उपजाने वाले किसानों को सरकार ₹7000 के हिसाब से पैसे देगी। इसके अलावा वैकल्पिक फसलों का बीमा कराने के लिए प्रीमियम का खर्चा भी सरकार की ओर से वहन किया जाएगा।

इस अवसर पर डॉ चौहान ने बताया की फसलों की चॉइस को बदलने के लिए हरियाणा सरकार ने वर्ष 2030 तक के लिए एक बागवानी विजन तैयार किया है। बागवानी विजन में भावांतर भरपाई योजना के तहत इस बार 23 फसलों को शामिल किया गया है जिनमें 14 सब्जियां भी शामिल हैं। इस योजना के तहत 21 फसलों के संरक्षित मूल्य निर्धारित किए गए हैं। साथ ही यह प्रावधान भी किया गया है कि यदि भावांतर भरपाई योजना में शामिल फल व सब्जियों की पूरी फसल प्राकृतिक आपदा के कारण नष्ट हो जाती है तो उसके पूरे खर्च की भरपाई मुख्यमंत्री बागवानी बीमा योजना के अंतर्गत की जाएगी। इसके तहत किसानों को ₹30000 प्रति एकड़ के हिसाब से क्लेम मिलेगा। फलों के मामले में भरपाई की यह दर ₹40000 प्रति एकड़ होगी। इस बीमा योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को 2.5% राशि का भुगतान करना होगा।

डॉ चौहान ने बताया कि मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने किसानों के लिए एक और योजना शुरू की है। इसके तहत यदि कोई किसान 1 एकड़ क्षेत्र में 400 पौधे लगाता है तो उसे अगले 3 साल तक प्रदेश सरकार प्रति एकड़ ₹10000 देगी। यह भी जल संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के उद्देश्य से किया गया है। उन्होंने बताया कि इस बार वैकल्पिक फसलों की सूची से बाजरा को हटा लिया गया है।

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आचार्य अभिनवगुप्त से आमजन को अवगत कराना जरूरी

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विचार गोष्ठी में अभिनव गुप्त के व्यक्तित्व व शैव दर्शन पर चर्चा

करनाल । आचार्य अभिनवगुप्त जैसे विराट व्यक्तित्व वाले विद्वान एवं उनके अद्भुत शैव दर्शन के प्रति आज की युवा पीढ़ी का अनभिज्ञ होना अत्यंत दुख एवं चिंता का विषय है। आचार्य अभिनवगुप्त ही नहीं, उनके अलावा भी ऐसे कई विश्व स्तरीय मनीषी एवं विचारक हैं जिनके बारे में आज की युवा पीढ़ी को कोई जानकारी नहीं है। जनसाधारण और खासकर आज की युवा पीढ़ी को आचार्य अभिनवगुप्त के व्यक्तित्व एवं उनके जीवन दर्शन को समझना बहुत जरूरी है। ऐसे महापुरुषों की जीवनी पर छोटी पुस्तकों की एक श्रृंखला शुरू होनी चाहिए। मुख्यमंत्री श्री मनोहरलाल की अध्यक्षता में कार्य करने वाली हरियाणा ग्रंथ अकादमी ऐसे महापुरुषों के जीवन और दर्शन पर आधारित परिचयात्मक पुस्तकमाला प्रकाशित करने की योजना बनाएगी। इस शृंखला में पहली पुस्तक आचार्य अभिनव गुप्त के व्यक्तित्व और कार्यों को समर्पित होगी। यह टिप्पणी हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ.वीरेंद्र सिंह चौहान ने आचार्य अभिनवगुप्त की जयंती पर आयोजित राष्ट्रीय विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए की।

गोष्ठी के दौरान कई वक्ताओं एवं कश्मीरी विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए। गोष्ठी की शुरुआत करते हुए जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान के डॉ. रजनीश मिश्रा ने कहा कि विश्व भर का शिक्षित समुदाय जिस देश को सबसे ज्यादा पसंद करता है, वह भारत देश ही है। यह भारत की ज्ञान मूलक संस्कृति की विशेषता है। यह संस्कृति आत्मा को अभिमुख करने एवं स्वयं को अपने आप से साक्षात्कार कराने का ज्ञान देती है। इस संस्कृति में कुछ ऐसे भी प्रश्न पूछे जाते रहेंगे जो अन्य संस्कृतियों में मिलना मुश्किल है। जिस ज्ञान की हमें निरंतर खोज है वह मोक्ष देने वाला ज्ञान है। निरंतर इस ज्ञान की खोज में लिप्त रहने के कारण ही इस देश का नाम भारत सार्थक होता है। डॉ. मिश्रा ने कहा कि आचार्य अभिनवगुप्त ने ज्ञान और साधना की सभी धाराओं में लेखन किया।

कश्मीरी विद्वान और नाद पत्रिका के मुख्य संपादक सुनील रैना ने आचार्य अभिनवगुप्त के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्य की चर्चा कश्मीरी शैव दर्शन का उल्लेख किए बिना पूरी नहीं हो सकती। आचार्य अभिनव गुप्त 10 वीं शताब्दी के आसपास आए। विडंबना है कि अभिनवगुप्त के दर्शन को मात्र अकादमिक स्तर तक सीमित कर दिया गया है। उनके जीवन दर्शन को सरल भाषा में परिभाषित करने की जरूरत है ताकि आम लोग भी इसे समझ सकें। कश्मीर शिव शक्ति की भूमि रही है। निर्मल पुराण में कहा गया है कि कश्मीर की भूमि स्वयं पार्वती है। भगवान शिव उनके महेश्वर हैं।

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आर्यों ने ही बसाई थी हड़प्पा संस्कृति, उनके विदेशी होने की बात गलत : धुम्मन

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में सरस्वती नदी के ऐतिहासिक व वैज्ञानिक तथ्यों पर चर्चा

https://www.youtube.com/watch?v=HVXAGsBp2Y4

करनाल। पुराणों में वर्णित सरस्वती नदी कोई कपोल कल्पना नहीं, बल्कि एक सच्चाई थी। इस नदी के मूर्त रूप में सतह के ऊपर बहने से लेकर इसके अंतर्ध्यान होकर भूगर्भ में प्रवाहित होने तक के अब पर्याप्त पुरातात्विक एवं वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। वैदिक काल में सरस्वती नदी आदिबद्री के पास स्थित बंदर पुच्छ ग्लेशियर से अवतरित होकर राजस्थान की तरफ बहती थी। आदिबद्री सरस्वती का उद्गम स्थल है। इस नदी का इतिहास महाभारत काल से भी जुड़ता है। कहते हैं कि महाभारत युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र जैसी भूमि का चयन सरस्वती नदी को ध्यान में रखकर ही किया गया था। मान्यता है कि यहीं पर भगवान ब्रह्मा ने सरस्वती नदी के किनारे ब्रह्म सरोवर की स्थापना की थी और सृष्टि की भी रचना की। महाभारत काल में हुई एक बड़ी भूगर्भीय हलचल के बाद सरस्वती का पानी सतह के नीचे चला गया जो आज तक भूगर्भ में ही बहता है। ओएनजीसी एवं इसरो की रिपोर्ट ने इस ऐतिहासिक तथ्य की पुष्टि की है।

उपरोक्त जानकारी रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में सरस्वती नदी के उद्गम एवं इसके अस्तित्व के पुरातात्विक साक्ष्यों पर चर्चा के दौरान सामने आई। हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने इस महत्वपूर्ण विषय पर हरियाणा सरस्वती विरासत बोर्ड के उपाध्यक्ष धुम्मन सिंह किरमिच के साथ विस्तार से बातचीत की। डॉ. चौहान ने कहा कि हरियाणा की मनोहर सरकार सरस्वती नदी के प्रवाह पथ को फिर से स्थापित करने एवं नदी को पुनर्जीवित करने के लिए कृतसंकल्प है। वर्ष 2015 में प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही हरियाणा सरस्वती विरासत बोर्ड का गठन किया जाना सरकार की इस उद्देश्य के प्रति गंभीरता को दर्शाता है। यह विरासत बोर्ड राज्य भर में जहां-तहां बिखरे सरस्वती नदी के अवशेषों को ढूंढ कर उसे पुनर्जीवित करने के लिए प्रयासरत है।

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ऑक्सीवनों की स्थापना व पुराने पेड़ों के लिए ‘पेंशन’ अनूठी योजनाएं : चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में पर्यावरण प्रदूषण पर चर्चा

करनाल। हरियाणा सरकार ने राज्य भर में ऑक्सीवनों की स्थापना व विकास के लिए का फैसला किया है। इस दिशा में पहल करते हुए करनाल में ऑक्सीवन शुरू भी हो चुका है और पंचकूला में भी ऑक्सीवन प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। ऐसा पर्यावरण को स्वच्छ और सांस लेने लायक बनाए रखने के उद्देश्य से किया जा रहा है। एक पेड़ जीवन भर के दौरान करीब 70 लाख का ऑक्सीजन देता है। इसलिए, पौधे जरूर लगाएं और उनका संरक्षण भी करें। जितना पेड़ लगाएंगे, उतना ही पर्यावरण को बचाएंगे। बड़े वृक्षों के संरक्षण के लिए मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने अनूठी पेंशन योजना भी शुरू करने का ऐलान किया है जिसके अंतर्गत वयोवृद्ध वृक्षों की संभाल करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं को राज्य सरकार उनकी इस सेवा के एवज़ में पेंशन देगी। रेडियो ग्रामोदय के ‘वेकअप करनाल’ कार्यक्रम में हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के करनाल स्थित क्षेत्रीय अधिकारी शैलेंद्र अरोड़ा से पर्यावरण प्रदूषण पर चर्चा के दौरान हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने की। उन्होंने कहा कि जीव-जंतु, पृथ्वी, जल वायु और मिट्टी आदि मिलकर हमारे पर्यावरण को बनाते हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों के आपसी असंतुलन को ही पर्यावरण प्रदूषण कहते हैं। पर्यावरण प्रदूषण से सबका जीवन खतरे में पड़ सकता है। एक पेड़ एक बच्चे के बराबर होता है। इसलिए उनका भी संरक्षण जरूरी है।

Wake Up Karnal : Environment Day

पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कारकों की पहचान करते हुए शैलेंद्र अरोड़ा ने कहा कि जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, बायो मेडिकल वेस्ट, म्युनिसिपल सॉलि़ड वेस्ट, ई-कचरा, बैटरी का कचरा आदि मिलकर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 6 महीने के दौरान प्रदूषण को रोकने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने करनाल में कई कदम उठाए हैं। प्रदूषित जल के शोधन के लिए मल संयंत्रों में ऑनलाइन सिस्टम और नई एसपीआर टेक्नोलॉजी लगाई गई है। उनके पैरामीटर सख्त कर दिए गए हैं जिनका पालन करना अनिवार्य है। इनका पालन न करने वालों पर जुर्माने की राशि का प्रस्ताव दिया गया है। इसके अलावा वाटर एक्ट जिसे जल प्रदूषण नियंत्रण एक्ट 1974 भी कहा जाता है के तहत अवैध रूप से स्थापित उद्योगों के खिलाफ भी विभाग ने कड़ी कार्रवाई की है। ऐसे सात – आठ उद्योगों को बंद भी किया गया है। 1 साल के भीतर वॉटर एक्ट के तहत 9 मामले दर्ज किए गए हैं। स्पेशल एनवायरनमेंट एक्ट के तहत उद्योगों एवं बिल्डरों के खिलाफ कार्रवाई रूटीन की प्रक्रिया है। उन्होंने स्पष्ट किया की गंदा पानी छोड़ने वाले उद्योगों के खिलाफ वाटर एक्ट के तहत करवाई होती है। इसके अलावा बिना अनुमति के स्थापित होने वाले उद्योगों के खिलाफ भी कार्यवाही की जाती है।

डॉ. बीरेन्द्र सिंह चौहान ने पूछा कि उद्योग आम तौर पर किस-किस तरह से पर्यावरण संरक्षण के नियमों को तोड़ते हैं? उनके खिलाफ किस तरह की शिकायतें आती हैं? इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि जल शोधन संयंत्रों की नियमित चेकिंग की जाती है। इस दौरान जहां भी छेड़छाड़ पाई जाती है वहां उन्हें नोटिस देकर कार्रवाई की जाती है। इतने पर भी ना मानने पर उन उद्योगों को बंद कराने की प्रक्रिया शुरू होती है और उन पर पर्यावरण कंपनसेशन भी लगाया जाता है।

एडवोकेट राजेश शर्मा ने शिकायत की कि करनाल क्षेत्र में कई उद्योगों ने बिना अनुमति के सबमर्सिबल पंप लगा रखे हैं। इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि कुछ उद्योग प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और कुछ उद्योग नगर निगम के दायरे में। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दायरे में आने वाले उद्योगों से ऑनलाइन आवेदन मांगे जाते हैं। उनकी निगरानी के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी होती है। जो उद्योग नियमों का पालन नहीं करते, उन पर कार्रवाई होती है।

इस अवसर पर डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने केंद्र सरकार की नई पहल के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर घोषणा की है की वर्ष 2025 तक देश की हर स्थान पर पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की व्यवस्था की जाएगी। केंद्र सरकार का ग्रीन एनर्जी पर जोर है। सौर ऊर्जा के मामले में भारत विश्व नेता बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने पूछा कि करनाल शहर की हवा राज्य के अन्य शहरों के मुकाबले पर्यावरण की दृष्टि से कितनी प्रदूषित है? इस पर शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया कि 2 दिन का डाटा एयर क्वालिटी इंडेक्स (ए क्यू आई) के मानकों के अनुसार 54 और 73 के आसपास था। उन्होंने बताया कि करनाल का ए क्यू आई कुरुक्षेत्र के मुकाबले बेहतर है।

हरियाणा के ग्रामीण अंचल में पर्यावरण से जुड़े मसले और बड़ी चुनौतियां क्या हैं? डॉ चौहान के इस सवाल पर अरोड़ा ने कहा कि गांव में सीवरेज सिस्टम का ना होना एक बड़ी चुनौती है। स्मार्ट सिटी के लिहाज से पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए शहर में काम शुरू हुआ है। इसके तहत ट्री-प्लांटेशन और रोड क्लीनिंग की जा रही है।

कई जगह लग रहे सॉलिड वेस्ट प्लांट

शैलेंद्र अरोड़ा ने बताया की कचरा निस्तारण के लिए करनाल में एक सॉलिड वेस्ट प्लांट पहले से कार्यरत है। इसके अलावा सोनीपत में भी एक प्लांट का निर्माण हो रहा है। असंध क्षेत्र में भी एक बहुत बड़ा प्लांट लगने वाला है। पंचायती राज विभाग ने 35 छोटे-छोटे प्रोजेक्ट का प्रस्ताव सरकार को भेज रखा है। अन्य जगहों पर डंपिंग ग्राउंड मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि करनाल जिले के जल स्रोतों में यमुनानगर का औद्योगिक कचरा मिलने के संबंध में यमुनानगर के संबंधित अधिकारियों से औपचारिक शिकायत कर इसे रोकने के लिए कदम उठाने के लिए कहा गया है। इस सिलसिले में 6 महीने पहले भी दोनों जिलों के अधिकारियों के बीच पत्राचार हुआ था। शैलेंद्र अरोड़ा ने गीले और सूखे कचरे को घर में ही अलग-अलग करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इससे कूड़ा निस्तारण की प्रक्रिया आसान हो जाती है।

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पब्लिक स्कूलों की तर्ज पर होगी सरकारी स्कूलों में पढ़ाई, बच्चों को मिलेंगे टेबलेट

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वेकअप करनाल में शिक्षा जगत को कोरोना से मिलने वाली चुनौतियों पर चर्चा

करनाल। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने के लिए हरियाणा के सरकारी विद्यालयों को पब्लिक स्कूलों की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने प्रदेश के एक हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों को संस्कृति मॉडल स्कूल बनाने का फैसला किया है। सरकारी स्कूलों को संस्कृति मॉडल स्कूलों में परिवर्तित करने के लिए गुणवत्ता के कड़े मानदंड निर्धारित किए गए हैं। इन स्कूलों में पारंपरिक कक्षाओं के साथ-साथ स्मार्ट क्लासरूम भी होंगे। एक कक्षा में अधिकतम 25 से 30 विद्यार्थी ही रखे जाएंगे और प्रत्येक 25 विद्यार्थी के लिए एक शिक्षक तैनात होगा। संस्कृति मॉडल स्कूलों को सीबीएसई से संबद्ध किया गया है और इनमें अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होगी। इन मॉडल स्कूलों में बुनियादी संसाधन भी अत्याधुनिक एवं उन्नत किस्म के होंगे जिनके लिए बड़े-बड़े स्क्रीन वाले एलईडी मॉनिटर खरीदे गए हैं।

रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम के दौरान कोरोना से स्कूली शिक्षा को मिलने वाली चुनौतियों पर हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक मनोज कुमार लाकड़ा के बीच चर्चा के दौरान यह जानकारी उभरकर सामने आई। डॉ. चौहान ने कहा कि कोरोना महामारी ने सामाजिक आचार-व्यवहार से लेकर व्यक्तिगत जीवन शैली तक जीवन के लगभग हर पक्ष को प्रभावित कर दिया है। इससे न सिर्फ मिलने-जुलने का तरीका बदला है, बल्कि पठन-पाठन की व्यवस्था भी बदल गई है। महामारी ने शिक्षा जगत के सामने नई चुनौतियां पेश की हैं। मनोज लाकड़ा ने भी कहा कि कोरोना से शिक्षा का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है। शिक्षण व्यवस्था अब तकनीक पर निर्भर हो गई है। बच्चे अब दिनभर कंप्यूटर और मोबाइल के सामने बैठे रहते हैं। पढ़ाई ऑनलाइन होने लगी है। यह बदलाव जरूरी और अपेक्षित भी था, हालांकि इसके कुछ स्याह पक्ष भी हैं।

मनोज ने बताया कि स्मार्ट क्लास के तहत आठवीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों को टेबलेट देने की योजना है जिनमें पाठ्यक्रम (करिकुलम) डाला जाएगा। उन टेबलेट की खरीद हो चुकी है और उनमें सॉफ्टवेयर डालने का काम अभी बाकी है। बच्चों को एक आईडी और पासवर्ड दिया जाएगा जिसके माध्यम से उन्हें होमवर्क दिया जाएगा और उनके काम का मूल्यांकन भी ऑनलाइन ही होगा।

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एक यूनिट रक्तदान से होती है तीन मरीज़ों की मदद : डॉ. बेनीवाल

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करनाल। रक्तदान लोगों की जान बचाने का अंतिम विकल्प होता है। यह 100 फ़ीसदी सुरक्षित भी नहीं है। रोगी को रक्त चढ़ाने के बाद अलग-अलग अंतराल पर कुछ जटिलताएं पेश आ सकती हैं। इसे रक्तदान के साइड इफेक्ट्स कह सकते हैं। इसके बावजूद अनेक मामलों में रक्तदान ही लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए रक्तदान को महादान कहा जाता है।
हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रक्तदान पर आईएमए हरियाणा के संरक्षक एवं पूर्व अध्यक्ष डॉ. वेद बेनीवाल, सिरसा स्थित शिव शक्ति ब्लड बैंक के संचालक एवं प्रबंधक आर.एम. अरोडा एवं नीलोखेड़ी के रक्तदान एक्टिविस्ट योगी गाबा से रक्तदान के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा में यह टिप्पणी की। डॉ चौहान ने कहा कि विश्व रक्तदाता दिवस पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि रक्त उपलब्ध न होने के कारण किसी की जान न जाए।
डॉ. आर.एम अरोडा ने कहा कि एक यूनिट रक्तदान से हम 3 रोगियों की जान बचा सकते हैं। उन्होंने बताया कि रक्त के तीन अवयव होते हैं – लाल रक्त कण, प्लेटलेट्स और प्लाज्मा। यह तीनों कंपोनेंट तीन अलग-अलग रोगियों की जान बचाने के काम आते हैं।


डॉ वेद बेनीवाल ने बताया कि रक्तदान दिवस ब्लड ग्रुप की खोज करने वाले व्यक्ति कार लैंड्स के जन्मदिन के अवसर पर 14 जून को मनाया जाता है। इस दिन रक्तदाताओं को सम्मानित कर हम उनका आभार प्रकट करते हैं। भारत में वर्ष 1942 ने कोलकाता में पहले ब्लड बैंक की स्थापना की गई थी। महिलाओं और खासकर गर्भवती महिलाओं को रक्त की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। प्रसव के दौरान रक्त की बहुत ज्यादा कमी हो जाने पर उन्हें रक्त चढ़ाना पड़ता है। लड़का और लड़की के बीच अंतर करने की हमारी सामाजिक रूढ़ियों के कारण भी लड़कियों में खून की कमी अक्सर पाई जाती है। थैलेसीमिया के मरीजों के लिए तो खून चढ़ाना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के शरीर में रक्त निर्माण कि अपनी प्रक्रिया बाधित हो जाती है। उन्होंने बताया कि 100 यूनिट रक्त में दो तिहाई हिस्सा महिलाओं को ही जाता है। महिलाओं एवं बच्चियों में रक्त की कमी हमारी सामाजिक सोच को प्रतिबिंबित करती है।

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बाल श्रम अपराध, जहां भी देखें 1098 पर तुरंत दर्ज कराएं शिकायत : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय  हो’ में श्रम कानून एवं बच्चों के शोषण पर चर्चा

करनाल। बाल श्रम अभिशाप है। यह सामाजिक अपराध भी है। बाल श्रम होता देख कर भी चुप रहना इस कृत्य में बराबर का भागीदार होने जैसा है। इसलिए संवेदनशील बनें और इसके खिलाफ आवाज उठाएं। आप चाहें तो गुमनाम रहकर भी 1098 पर ऐसे मामलों की सूचना दे सकते हैं। बच्चों का उत्पीड़न करना अपराधी को पैदा करने जैसा है क्योंकि बड़ा होने पर ऐसे बच्चों के अपराध की ओर उन्मुख होने की संभावना ज्यादा होती है। इसलिए, सजग नागरिक का कर्तव्य निभाएं।

रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘जय हो’ में बाल श्रम कानून एवं बच्चों के शोषण पर विषय पर हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान और हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त श्रमायुक्त अनुपम मलिक के बीच चर्चा के दौरान उभर कर सामने आए। दोनों इस बात पर एकमत थे कि यदि कोई हमारा परिचित या मित्र भी बाल शोषण में शामिल हो, तो उसे टोकना हमारा धर्म है।

जय हो में आज चर्चा बाल श्रम पर

डॉ. चौहान ने कहा कि यह दुर्भाग्य की बात है कि तमाम सख्ती और कानून के बावजूद बाल श्रम एवं शोषण का देश में अब तक उन्मूलन नहीं हो सका है। अनुपम मलिक ने उनकी बात से सहमति जताते हुए कहा कि यद्यपि बाल श्रम एवं शोषण के मामले पहले के मुकाबले काफी कम हुए हैं, फिर भी पूरी तरह यह आज भी खत्म नहीं हो सका है।

अनुपम मलिक ने बताया कि बाल श्रम के खिलाफ वर्ष 2006-2007 में श्रम विभाग की ओर से एक मुहिम चलाई गई थी जिसके तहत ऐसे मामलों के सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया था। श्रम निरीक्षकों को कैमरे भी दिए गए थे। ताबड़तोड़ छापों का सिलसिला शुरू किया गया था। इससे बाल शोषण में काफी कमी आई। चंडीगढ़ और दिल्ली के बीच हाईवे पर स्थित सैकड़ों ढाबों में बाल श्रम एवं उत्पीड़न के अनगिनत मामले थे, लेकिन विभाग की सख्ती के बाद बाल शोषण के मामले अब वहां नगण्य के बराबर हैं। ढाबों, दुकानों एवं फैक्ट्रियों से छुड़ाए गए बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए हरियाणा के फरीदाबाद, यमुनानगर और पानीपत में बाल पुनर्वास केंद्र बनाए गए थे।

नुपम मलिक के अनुसार यमुनानगर, पानीपत और फरीदाबाद के मामलों में अलग-अलग सोच देखी गई। फरीदाबाद में जहां मां-बाप ही अपने बच्चों को मारपीट कर कारखानों में काम करने के लिए भेजते थे, वहीं यमुनानगर में लोग यूपी से आकर अपने बच्चों को फैक्ट्री मालिकों के पास गिरवी रख जाया करते थे। विभाग ने ऐसे मां-बाप के खिलाफ भी सख्ती की और उन्हें पकड़ना शुरू किया। इसके बाद ऐसे मामलों पर तेजी से अंकुश लगा और बाल श्रम लगभग समाप्ति के कगार पर पहुंचा। लेकिन पानीपत का मामला अलग ही है।

डॉ. चौहान ने पूछा कि भारतीय कानून में बाल श्रम की परिभाषा क्या है और इसके दायरे में कितने साल तक के बच्चे आते हैं? बाल श्रम के खिलाफ दंड के क्या प्रावधान हैं? पूर्व श्रम आयुक्त अनुपम मलिक ने बताया कि अब 16 वर्ष तक के बच्चों को बाल श्रम कानून के दायरे में रखा गया है। पहले यह सीमा 14 वर्ष तक थी। 16 से 18 वर्ष के बच्चे किशोर वय से ऊपर के माने जाते हैं और उन्हें काम का प्रशिक्षण लेने की अनुमति दी गई है।18 वर्ष से ऊपर के बच्चों को वयस्क माना गया है।

उन्होंने बताया कि बाल श्रम पर अंकुश लगाने में सुप्रीम कोर्ट का बहुत बड़ा योगदान है। यदि कोई नियोक्ता 16 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग बच्चों से काम करवाता पकड़ा जाता है, तो बाल श्रम कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई के अतिरिक्त अतिरिक्त उसे ₹50000 का जुर्माना भी भुगतना होगाजो उस बच्चे के कल्याण के लिए बाल कल्याण कोष में जमा कराया जाएगा। इस कोष में सरकार भी अपनी तरफ से पैसे जमा करती है। बाल श्रम के मामलों की सूचना देने के लिए एक हेल्पलाइन नंबर 1098 भी जारी किया जा चुका है, जिस पर अपनी पहचान उजागर न करते हुए भी सूचना दी जा सकती है। इस नंबर से शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल कल्याण विभाग, पुलिस विभाग और श्रम विभाग जुड़े हुए हैं।

बाल श्रम और बढ़ा रहा गरीबी

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि अक्सर कहा जाता है ग़रीबी के कारण बाल श्रम होता है मगर विशेषज्ञ इसके विपरीत राय रखते हैं। अनुपम मलिक ने जोर देकर कहा कि बाल श्रम का कारण गरीबी नहीं, बल्कि यह एक धंधा बन गया है। बाल श्रम गरीबी के कारण नहीं, बल्कि कम खर्च में ज्यादा मुनाफा कमाने के उद्देश्य से कराया जा रहा है। बाल श्रम से गरीबी और बढ़ रही है क्योंकि एक बाल श्रमिक एक वयस्क की नौकरी छीनता है। बाल श्रम के खिलाफ अन्य देशों के मुकाबले भारत का कानूनी ढांचा कितना मजबूत है? डॉ. चौहान के इस सवाल पर मलिक ने कहा कि भारतीय कानून का स्तर किसी से कम नहीं है। पहले के मुकाबले अब कानून काफी सख्त हो गया है। किसी आरोपी के पकड़े जाने पर अब उसका कानून के फंदे से छूटना बहुत मुश्किल है। श्रम कानून का सूत्र वाक्य है -निर्दोष साबित होने से पहले तक आप दोषी हैं।

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अपनी आँखों का रखे ध्यान, नेत्रदान भी है महादान

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रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस पर चर्चा

करनाल। आंखों की देखभाल जरूरी है।साफ और ठंडे पानी से आंखों को नियमित रूप से धोएं और बिना जरूरत कोई दवा न लें। उचित समय पर चश्मा लगाएं और 60 वर्ष की उम्र हो जाने पर मोतियाबिंद की जांच नियमित रूप से कराते रहें..कंप्यूटर या मोबाइल स्क्रीन पर लंबे समय तक निगाह गड़ाए रखना नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए हर 15-20 मिनट के बाद 10-15 सेकंड का विश्राम अवश्य लें। बचाव के ये उपाय आपको काफी हद तक नेत्र रोगों एवं नेत्रहीनता से बचा सकते हैं।

वेक अप करनाल

उपरोक्त विचार रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान व करनाल के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ एवं माधव नेत्र बैंक के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. भरत ठाकुर के बीच हुई बातचीत में उभर कर सामने आए। कार्यक्रम में नेत्रदान के महत्व और प्रक्रिया को लेकर विस्तार से से बातचीत हुई।

डॉ. भरत ठाकुर ने बताया कि देश में दृष्टिबाधित लोगों में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस के शिकार लोगों का अनुपात लगभग 1% है जिनकी संख्या 80 लाख के करीब है। इसके मुकाबले दोनों आंखों से दृष्टिबाधित लोगों की संख्या मात्र दो लाख है। कॉर्नियल ब्लाइंडनेस को सिर्फ कॉर्निया के प्रत्यारोपण से ही दूर किया जा सकता है जो नेत्रदान से ही संभव है। आंखों के अगले हिस्से में स्थित काली पुतली को ही कॉर्निया कहते हैं। इसे नेत्रदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आंखों से निकाला जाता है। उन्होंने बताया कि कॉर्निया प्याज के छिलके जितना मोटा होता है और इसका आकार 10 मिलीमीटर का होता है।

आंखों के अगले हस्से में स्थित काली पुतली को ही कॉर्निया कहते हैं। इसे नेत्रदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी आंखों से निकाला जाता है। उन्होंने बताया कि कॉर्निया प्याज के छिलके जितना मोटा होता है और इसका आकार 10 मिलीमीटर का होता है।

नेत्रदान के लिए पात्र व्यक्ति कौन है और एक मृत व्यक्ति के अंगों से कितने लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है? डॉ. बीरेंद्र सिंह चौहान के इस सवाल पर डॉ. ठाकुर ने बताया कि एक मृत व्यक्ति के शरीर से कुल 11 लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है जिनमें दो लोगों को कॉर्निया का प्रत्यारोपण भी शामिल है। कॉर्निया को 6 घंटे के भीतर दान पाने वाले व्यक्ति की आंखों में प्रत्यारोपित करना होता है। इसे गंतव्य तक सड़क या वायु मार्ग से पहुंचाने के लिए कई बार ग्रीन कॉरिडोर भी बनाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि नेत्रदान के लिए आयु की कोई सीमा निर्धारित नहीं है। 100 साल के व्यक्ति की आंखें भी अगर मृत्यु के समय ठीक हो, तो उसके कॉर्निया का प्रत्यारोपण के लिए इस्तेमाल हो सकता है।

डॉ. भरत ठाकुर ने बताया बचपन में खेलते समय आंखों में लगी चोट का यदि समय पर उपचार न हो तो आगे चलकर कॉर्निया खराब होने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा विटामिन-]ए की कमी से भी कॉर्निया खराब होता है। कॉर्निया कैमरे के लेंस की तरह होता है जो आंखों के सामने आने वाली आकृति को फोकस करता है। उन्होंने बताया कि भारत में कॉर्निया प्रत्यारोपण 45 वर्ष पहले आई बैंक एसोसिएशन ऑफ इंडिया एवं भारत सरकार के सहयोग से शुरू किया गया था।

 

कार्निया प्रत्यारोण में करनाल देश में सातवें स्थान परडॉ. भरत ठाकुर ने बताया कि कॉर्निया प्रत्यारोपण के मामले में करनाल जिले का स्थान देश में सातवां है।यहां एक साल के भीतर करीब एक हजार नेत्रदान दर्ज किए जाते हैं। इसमें माधव नेत्र बैंक समेत अन्य संगठनों की भूमिका अहम है। इस नेत्र बैंक की स्थापना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सह सरकार्यवाह अरुण कुमार की प्रेरणा से की गई थी। नेत्र बैंकों का काम दानदाताओं से नेत्र लेकर उन्हें संरक्षित करना और जरूरतमंदों को उपलब्ध कराना है। उन्होंने बताया कि वैसे तो देश भर में 1100 नेत्र बैंक पंजीकृत हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ 200 एक्टिव हैं। उनमें भी मात्र 80 नेत्र बैंक ऐसे हैं जो 50 से अधिक नेत्रदान करवा सकते हैं। देशभर में एक साल के भीतर करीब 20,000 लोगों को कॉर्निया का प्रत्यारोपण संभव हो पाता है। इस बीच समाजसेवी कपिल अतरेज़ा ने बताया कि नेत्रदान का संकल्प पत्र ऑनलाइन भी भरा जा सकता है।

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हरियाणा के 5500 गांवों में अब 24 घंटे बिजली आपूर्ति : डॉ. चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में गांव जलमाना पर चर्चा

करनाल। हरियाणा के करीब 5500 गांव ऐसे हैं जहां चौबीसों घंटे बिजली की अबाध आपूर्ति हो रही है। प्रदेश सरकार की ‘म्हारा गांव, जगमग गांव’ योजना के तहत 24 घंटे बिजली आपूर्ति करने पर वर्ष 2015 से ही काम जारी है। यह जानकारी हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम ‘म्हारे गाम की बात’ में गांव जलमाना पर चर्चा के दौरान दी।जलमाना गांव पर चर्चा में डॉ. चौहान के अलावा कार्यक्रम संचालक प्रवीण धनखड़, वरिष्ठ भाजपा नेता सुरेश गोयल और अटल सेवा केंद्र संचालक रवि गुप्ता भी शामिल थे। डॉ. चौहान ने इस अवसर पर गांवों में नलों से बेकार बहने वाले पानी पर चिंता जताते हुए कहा कि पानी की बर्बादी नहीं होनी चाहिए। इस समस्या की तरफ रवि गुप्ता ने ध्यान दिलाते हुए कहा था कि गांव जलमाना में कई जगह नलों से पानी बेकार बहता रहता है।

डॉ. चौहान ने रवि गुप्ता से अनुरोध किया कि वह स्वयं इस दिशा में पहल करते हुए ऐसे जल स्रोतों को चिन्हित करें जहां नलों से पानी बेकार बहता रहता है ताकि पानी की बर्बादी रोकने के लिए कोई योजना बनाई जा सके।

भाजपा कार्यकर्ता सुरेश गोयल ने जलमाना गांव का परिचय एवं पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि यह एक सिख बहुल गाँव है जहां 36 बिरादरियों के लोग रहते हैं। यह गांव ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मान्यताओं के अनुसार यहां महर्षि परशुराम के पिता बाबा जमदग्नि ने तपस्या की थी। इसलिए इस गांव का नाम जमदग्नि के नाम पर पड़ा और बदलते – बदलते जलमाना हुआ।गोयल ने बताया कि जलमाना गांव का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। यह गांव अपनी न्यायप्रियता के लिए जाना जाता है। जलमाना तीर्थ में एक बहुत बड़ा मंदिर है जिसके अंदर काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ एक तालाब है। मान्यता है कि इस तालाब के बीचो-बीच वाले स्थान पर ऋषि जमदग्नि ने तपस्या की थी। यहां दूज के दिन एक बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें भाग लेने के लिए लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं।

गांव की विशेषता बताते हुए अटल सेवा केंद्र संचालक रवि गुप्ता ने कहा कि गांव जलमाना में मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा तीनों ही स्थित हैं। गांव में आपसी भाईचारे का आलम यह है कि यहां सभी त्योहार सभी बिरादरियों के लोग मिलजुल कर मनाते हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश के लगभग सभी मुख्यमंत्री इस गांव का दौरा कर चुके हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी इस गांव का दौरा किया था।

प्रवीण धनखड़ के सवाल पर रवि गुप्ता ने बताया कि गांव में पशुओं और मनुष्य के लिए एक-एक सरकारी अस्पताल है जो अच्छी अवस्था में है। उन्होंने गांव के अस्पताल की चारदीवारी के निर्माण का मुद्दा उठाया। रवि ने कहा कि गांव में पक्की सड़कों का भी निर्माण हो चुका है और बिजली आपूर्ति की व्यवस्था भी संतोषजनक है।

गांव जलमाना में कितने जौहड़ हैं और उन पर अतिक्रमण की क्या स्थिति है? डॉ. चौहान के इस सवाल पर रवि गुप्ता ने बताया कि जलमाना में चार जोहड़ हैं जिनका क्षेत्रफल काफी बड़ा है। सुरेश गोयल ने अतिक्रमण का मुद्दा उठाते हुए कहा कि जौहड़ो पर नए अतिक्रमण तो नहीं हो रहे लेकिन पहले के कुछ अतिक्रमण को अब भी हटाया नहीं जा सका है।

म्हारे गाम की बात में जल्माना के साथियों के साथ बातचीत

इस पर डॉ. चौहान ने कहा कि मनुष्यों के अस्तित्व के लिए जलाशयों का अस्तित्व बचाना जरूरी है। गांव-शहरों के जलाशय किसी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि प्राकृतिक संपदा है। हरियाणा सरकार ने इसी को ध्यान में रखते हुए एक तालाब प्राधिकरण गठित किया है जो ग्रामीण अंचल के जोहडों के सौंदर्यीकरण का काम देखता है।

उन्होंने पूछा कि जलमाना पंचायत की अपने स्रोतों से कितनी आय होती है? इस पर सुरेश गोयल ने जानकारी दी कि जलमाना पंचायत के पास 24 एकड भूमि है जो उसकी आय का मुख्य स्रोत है। चर्चा के दौरान गांव में युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से निशुल्क कोचिंग शुरू करने की भी योजना तैयार की गई। रेडियो ग्रामोदय ने इस दिशा में आगे बढ़कर पूरा सहयोग एवं पहल करने का संकल्प लिया।

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