ग्रामोदय

हिंसा किसी डॉक्टरी चूक का समाधान नहीं : डॉ चौहान

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रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम जय हो में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर चिकित्सकों की समस्याओं पर चर्चा

करनाल। हर पेशे में कुछ खराब लोग हो सकते हैं। मेडिकल प्रोफेशन इससे अछूता नहीं है। कोई भी डॉक्टर अपने मरीज का नुकसान नहीं चाहता। मानवीय चूक उनसे भी संभव है, लेकिन हिंसा किसी डॉक्टरी चूक का समाधान नहीं है। डॉक्टर अपने मरीज को ठीक कर ही देगा, चिकित्सकों से ऐसे चमत्कार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। यह विचार हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय पर ‘जय हो’ कार्यक्रम में प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप अब्रोल, वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र चौहान और करनाल स्थित कल्पना चावला मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. राजेश गर्ग के साथ चर्चा के दौरान व्यक्त किए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि नियति मनुष्य को जिस रास्ते पर लेकर आ जाती है, वह अन्य रास्ते कभी बंद नहीं करती। डॉ. बिधान चंद्र रॉय भारतीय उपमहाद्वीप के एक ख्याति प्राप्त दुर्लभ चिकित्सक होने के साथ-साथ एक शानदार राजनेता भी थे। वह 14 वर्षों तक बंगाल के मुख्यमंत्री के पद पर रहे।

डॉ चौहान ने बताया कि डॉ. बी सी राय की जन्म एवं पुण्यतिथि दोनों 1 जुलाई ही है। बिहार में जन्मे डॉ. बी सी राय दो बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। उन्हें कोलकाता का मेयर बनने का भी अवसर प्राप्त हुआ था। डॉ. रॉय एशियाई महाद्वीप के पहले मेडिकल कंसलटेंट थे।

डॉ.चौहान ने डॉ. संदीप अबरोल और डॉ. राजेश गर्ग से पूछा कि करोना काल में चिकित्सकों को किन- किन परेशानियों का सामना करना पड़ा? इस पर दोनों चिकित्सकों ने बताया कि कोरोना काल में उन्हें काफी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। डॉ. अबरोल ने बताया कि 22 साल के करियर में इतना कठिन समय कभी देखने को नहीं मिला था। शुरू में अस्पताल में ऑक्सीजन की बहुत कमी थी, लेकिन 1 हफ्ते के अंदर ऑक्सीजन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित कर दी गई।

आज चिकित्सक बनना कितना सरल है? डॉ चौहान के इस सवाल पर डॉ राजेश गर्ग ने कहा कि एक डॉक्टर की डिग्री लेना आज अत्यंत कठिन कार्य हो गया है। सरकारी और प्राइवेट संस्थानों में मेडिकल की पढ़ाई के खर्च में आसमान जमीन का अंतर है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में जहां इसकी पढ़ाई में प्रतिवर्ष 40 से ₹50000 खर्च करने पड़ते हैं, वही प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में इसकी पढ़ाई का खर्च प्रतिवर्ष 13 से 15 लाख रुपये तक है। पूरे एमबीबीएस कोर्स की पढ़ाई का खर्च 70 से 80 लाख रुपये के बीच बैठता है। यह आम लोगों की पहुंच से बाहर है। उन्होंने कहा कि यूपीएससी की तर्ज पर इंडियन मेडिकल सर्विसेज बनाने की मांग वर्ष 1966-67 से ही हो रही है।

डॉ. संदीप अबरोल ने कहा कि डॉक्टरी के पेशे में वह स्वेच्छा से आए। मरीजों को स्वस्थ होते देखकर लगता है कि उनकी मेहनत सफल हुई। यह उन्हें बहुत खुशी प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि उनका डॉक्टरी का सफर काफी कठिन रहा और कई बार असफलताएं भी हाथ लगी।

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