ग्रामोदय

दशम गुरु गोबिंद सिंह ने क्षत्रिय तेज को फिर से जगाया : डॉ. चौहान

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करनाल। खालसा पंथ की स्थापना करते हुए दशमेश पिता श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने एक साथ कई सामाजिक रूढ़ियों पर आघात किया था। उनका मक़सद भारतीय समाज में कमज़ोर पड़ गए संघर्ष के सामर्थ्य अर्थात क्षात्र तेज़ को नए सिरे से प्रबल कर समाज को उस दौर के कट्टर और धर्मांध शासकों का मुक़ाबला करने में सक्षम बनाना था। हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष और निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने भारतीय नूतन वर्ष व खालसा पंथ के स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में यह टिप्पणी की।

रेडियो ग्रामोदय के इस विशेष कार्यक्रम में अतिथियों व श्रोताओं से रूबरू डॉ. चौहान ने कहा कि खालसा बनने के लिए जो लोग आगे आए उसमें समाज की विभिन्न जातियों और देश के विभिन्न हिस्सों के लोग थे। हम यह कह सकते हैं कि ख़ालसा सजाने की प्रक्रिया में श्री गुरु गोबिंद सिंह ने सब को साथ लिया। गुरु नानक खालसा कॉलेज करनाल के प्राचार्य डॉ. मेजर सिंह और राजकीय महाविद्यालय अम्बाला कैंट में इतिहास के प्राध्यापक डॉ. अतुल यादव ने इस कार्यक्रम में बतौर विशेषज्ञ खालसा पंथ की स्थापना और जलियांवाला बाग़ नरसंहार के समय की परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की।

डॉ. मेजर सिंह ने कहा कि ख़ालसा का अर्थ है सब प्रकार से शुद्ध आचरण करने वाला व्यक्ति। उन्होंने कहा कि श्री गुरु गोबिंद सिंह जो अपने अनुयाइयों से करवाना चाहते थे उसे स्वयं करके अपने आचरण से सिद्ध करते थे। उन्होंने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह अद्भुत शस्त्रधारी थे तो शास्त्र और साहित्य के निष्णात विद्वान भी थे। एक ही शख़्सियत के भीतर यह सारे गुण विरले ही मिला करते हैं।

बक़ौल डॉ. अतुल यादव जलियांवाला बाग़ में अंग्रेजों ने जिस जघन्य नरसंहार को अंजाम दिया उसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल डाली। अनेक युवा क्रांतिकारी इस घटना के बाद क्रांति की राह पर निकले और उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता।

पाठ्यक्रमों में भारतीय महापुरुषों की बलिदान गाथा शामिल हो

रेडियो ग्रामोदय के कार्यक्रम में शामिल तीनों शिक्षाशास्त्री इस बात पर सहमत थे कि हमारे स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रमों में भारतीय महापुरुषों के संघर्ष और बलिदान के किस्से कायदे से नहीं पढ़ाए जा रहे। उन्होंने माना कि इस दृष्टि से पाठ्यक्रम में बदलाव समय की आवश्यकता है। हरियाणा ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने इस संबंध में कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति शिक्षा और पाठ्यक्रम को भारत केंद्रित बनाने की वकालत करती है। पाठ्यक्रम में परिवर्तन का रास्ता इसी नीति परिवर्तन से निकलेगा और यह कार्य आने वाले कुछ वर्षों में देश के शैक्षिक नेतृत्व को संजीदगी और सावधानी के साथ करना पड़ेगा।

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