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कोरोना से संग्राम में अग्रिम मोर्चे की योद्धा है आशा वर्कर: डॉ. चौहान

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संकट काल में हर घर तक छह बार पहुँच का दावा

करनाल। गांव में कोरोना संक्रमितों का डोर टू डोर सर्वेक्षण करना हो या होम आइसोलेशन में भेजे गए कोरोना मरीजों को दवाओं की किट पहुंचाने का काम, गर्भवती महिलाओं की जांच करानी हो या प्रसव के लिए उन्हें अस्पताल ले जाने का काम, नवजात बच्चों का टीकाकरण हो या डेंगू-मलेरिया से बचने के लिए गांव में स्प्रे कराने का काम, अपनी जान जोखिम में डालकर भी स्वास्थ्य के हर मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में खड़ी रहने वाली मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकत्रियों को सेल्यूट तो बनता ही है।

सरकार द्वारा आमजन के लिए प्रदत्त स्वास्थ्य सुविधाओं को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण कड़ी का काम करने वाली इन आशा वर्करों को अपने काम के बदले कोई वेतन नहीं मिलता। जनसामान्य के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली इन मान्यता प्राप्त महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अद्भुत है।
हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रेडियो ग्रामोदय के वेकअप करनाल कार्यक्रम में आशा वर्करों के कार्यों पर चर्चा के दौरान यह टिप्पणी की। उनके साथ चर्चा में शामिल थे करनाल के जिला आशा कोऑर्डिनेटर संजीव एवं आशा वर्कर कविता। डॉ. चौहान ने बताया कि प्रति एक हजार की आबादी वाले क्षेत्र के लिए एक आशा वर्कर की नियुक्ति की जाती है। इस समय करनाल जिले में 1142 आशा वर्कर कार्यरत हैं क़रीब 40 आशा वर्करों की रिक्तियां मौजूद हैं। कोरोना काल में सरकार की स्वास्थ्य सुविधाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाना आशा वर्करों की बदौलत ही संभव हो पाया है।
संजीव कुमार ने स्पष्ट किया कि कोरोना के दौरान 6 बार किए गए डोर टू डोर सर्वेक्षण में संक्रमण की स्थिति का पता लगाया गया और लक्षण वाले लोगों को जांच के लिए विभिन्न अस्पतालों में भेजा गया। आशा वर्करों ने होम आइसोलेशन में भेजे गए मरीजों को सरकारी दवाओं की किट पहुंचाने का काम भी किया। संजीव ने बताया कि सर्वेक्षण के लिए सरकार की ओर से एक मोबाइल ऐप तैयार किया गया है जिसे हर आशा वर्कर को दिया गया है। इस ऐप के जरिए संक्रमित मरीजों का डाटा दर्ज किया जाता है। कविता ने बताया कि कोरोना सर्वे के दौरान आशा वर्करों को सरकार की तरफ़ से मोबाइल फ़ोन,थर्मल स्कैनर व थर्मामीटर आदि दिए गए ।

गर्भावस्था और शिशु के जन्म के बाद करती है जच्चा-बच्चा की संभाल

जिला कोऑर्डिनेटर संजीव ने बताया कि अपने निर्धारित क्षेत्र में हर निवासी तक पहुंचना आशा कार्यकर्ताओं का दायित्व है। घर हो या डेरा, आशा वर्कर हर जगह जाकर लोगों के स्वास्थ्य का जायजा लेती हैं। उन्हें अपने क्षेत्र में हुए हर जन्म एवं मृत्यु का भी पंजीकरण करना पड़ता है।संजीव ने बताया कि कोरोना महामारी फैलने से पहले आशा वर्कर गांव की महिलाओं के स्वास्थ्य की देखभाल करती थीं। गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण करवाना, प्रसव पूर्व रक्तचाप, मधुमेह एवं एचआईवी आदि की जांच करवाना और मलेरिया एवं डेंगू से बचाव के लिए समय-समय पर गांव में दवा का छिड़काव कराना आशा वर्कर के दायित्वों में शामिल है। संजीव ने बताया कि गांव में गर्भवती महिलाओं की सूची बनाने, प्रसव से पूर्व तीन-चार बार चेकअप कराने, उनका अल्ट्रासाउंड कराने, प्रसव के लिए गर्भवती महिलाओं को अस्पताल लेकर जाने और डिलीवरी के बाद जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य का जायजा लेने के लिए आशा वर्करों को कम से कम 6 बार उनके घर जाना पड़ता है।इसके अलावा जच्चा से भी प्रसव बाद पेश आने वाली परेशानियों के बारे में पूछा जाता है। कोई परेशानी होने पर आशा वर्कर एंबुलेंस बुलाकर ऐसी महिलाओं को अस्पताल ले जाती हैं। कविता ने बताया कि बच्चे के जन्म के बाद से लेकर 5 वर्ष की उम्र होने तक आशा वर्करों को बच्चे की देखभाल करनी पड़ती है। उन्हें बच्चे के हर टीकाकरण के शेड्यूल का ध्यान रखना पड़ता है और बच्चे की मां को इसके लिए प्रेरित करना पड़ता है। जन्म के 1 महीने के बाद बीसीजी के टीके से लेकर 10 साल का होने तक बच्चों को टीके लगते रहते हैं। टीका लगने के बाद यदि बच्चे को बुखार आ जाए तो उसके स्वस्थ होने तक आशा वर्कर उसके स्वास्थ्य पर निगाह रखती हैं।

ऐसे नियुक्त होती है आशा वर्कर

आशा वर्करों की नियुक्ति प्रक्रिया क्या है और उनका मानदेय किस प्रकार तय किया जाता है? कुटेल निवासी एक प्रतिभागी के सवाल पर संजीव ने बताया कि गांव में एक वीएलसी कमेटी होती है जो आशा वर्करों का चयन करती है। किसी गांव में आशा वर्कर की जगह खाली हो तो सर्वप्रथम सरपंच की ओर से एक-दो दिन पहले इसकी मुनादी करा कर इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे जाते हैं। सरपंच ही इस तथ्य को अभिप्रमाणित करता है कि अभ्यर्थी उसके गांव की स्थाई निवासी है। आवेदन पत्र के साथ संलग्न दस्तावेजों को वीएलसी के पास भेजा जाता है। इस कमेटी में एएनएम के अलावा ब्लॉक आशा कोऑर्डिनेटर और प्रभारी मेडिकल अफसर (एमओ) शामिल होते हैं। एमओ तीन या चार लोगों की कमेटी गठित करता है जो अभ्यर्थी के दस्तावेजों के आधार पर उनकी अर्हता के अंक निर्धारित करती है।

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