ग्रामोदय

कबीर आज भी प्रासंगिक : डॉ. चौहान

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नारनोंद से जुड़े कवि देवदत्त ने अपने भावों को इस प्रकार व्यक्त किया,

कैसे खुश हों आपसे पैगंबर या पीर,
यदि तुमने समझी नहीं मात-पिता की पीड।
कर्म अनुसार फल मिले सीधा सा संदेश,
दुष्करमों की मार से बचा नहीं लंकेश।

उनके बाद नीलम त्रिखा ने स्वरचित पंक्तियों से समा बांध दिया। उन्होंने मां की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा-


मां पूजा मां अर्चना, मां ही एक अजान,
धरती से अंबर तक मां के कौन समान।
उसने ऐसा रंग दिया, त्यागी दिया घर बार
मन मंदिर में बजने लगा सुख का स्वर ताल।

जींद से जुड़े ओम प्रकाश चौहान ने जननी जन्मभूमि के प्रति अपने भावों को इस प्रकार व्यक्त किया —
जन्मभूमि का जगत में चुका सका ऋण कौन,
पल-पल प्राणी हित करे, रहे-रहे नित मौन

एक अन्य कवयित्री ममता कालरा ने कहा, —
घर में माई भूखी है, भोज करे संसार
कागज की नैया चली, कैसे उतरे पार
पढ़-लिख कर साक्षर बनो, हर मां का अरमान
शिक्षा पाकर छोड़ दिया, मां का ही सम्मान

कवि गोष्ठी में मुंबई से जुड़ी एक प्रतिभागी अलका जैन आनंदी ने जल संरक्षण की महत्ता की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा —
संरक्षण जल का करो, नहीं करो तुम व्यर्थ
घूंट घूंट अनमोल है, हमें बनाए समर्थ
प्रकृति से सबको मिला, जल का ये उपहार
सदुपयोग जल का करें, पिएं जंतु भी आज।

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