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एक यूनिट रक्तदान से होती है तीन मरीज़ों की मदद : डॉ. बेनीवाल

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करनाल। रक्तदान लोगों की जान बचाने का अंतिम विकल्प होता है। यह 100 फ़ीसदी सुरक्षित भी नहीं है। रोगी को रक्त चढ़ाने के बाद अलग-अलग अंतराल पर कुछ जटिलताएं पेश आ सकती हैं। इसे रक्तदान के साइड इफेक्ट्स कह सकते हैं। इसके बावजूद अनेक मामलों में रक्तदान ही लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए रक्तदान को महादान कहा जाता है।
हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने रक्तदान पर आईएमए हरियाणा के संरक्षक एवं पूर्व अध्यक्ष डॉ. वेद बेनीवाल, सिरसा स्थित शिव शक्ति ब्लड बैंक के संचालक एवं प्रबंधक आर.एम. अरोडा एवं नीलोखेड़ी के रक्तदान एक्टिविस्ट योगी गाबा से रक्तदान के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा में यह टिप्पणी की। डॉ चौहान ने कहा कि विश्व रक्तदाता दिवस पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि रक्त उपलब्ध न होने के कारण किसी की जान न जाए।
डॉ. आर.एम अरोडा ने कहा कि एक यूनिट रक्तदान से हम 3 रोगियों की जान बचा सकते हैं। उन्होंने बताया कि रक्त के तीन अवयव होते हैं – लाल रक्त कण, प्लेटलेट्स और प्लाज्मा। यह तीनों कंपोनेंट तीन अलग-अलग रोगियों की जान बचाने के काम आते हैं।


डॉ वेद बेनीवाल ने बताया कि रक्तदान दिवस ब्लड ग्रुप की खोज करने वाले व्यक्ति कार लैंड्स के जन्मदिन के अवसर पर 14 जून को मनाया जाता है। इस दिन रक्तदाताओं को सम्मानित कर हम उनका आभार प्रकट करते हैं। भारत में वर्ष 1942 ने कोलकाता में पहले ब्लड बैंक की स्थापना की गई थी। महिलाओं और खासकर गर्भवती महिलाओं को रक्त की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। प्रसव के दौरान रक्त की बहुत ज्यादा कमी हो जाने पर उन्हें रक्त चढ़ाना पड़ता है। लड़का और लड़की के बीच अंतर करने की हमारी सामाजिक रूढ़ियों के कारण भी लड़कियों में खून की कमी अक्सर पाई जाती है। थैलेसीमिया के मरीजों के लिए तो खून चढ़ाना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इस बीमारी से ग्रस्त लोगों के शरीर में रक्त निर्माण कि अपनी प्रक्रिया बाधित हो जाती है। उन्होंने बताया कि 100 यूनिट रक्त में दो तिहाई हिस्सा महिलाओं को ही जाता है। महिलाओं एवं बच्चियों में रक्त की कमी हमारी सामाजिक सोच को प्रतिबिंबित करती है।

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